ग्लोबल गुमटी

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मिर्ज़ा-साहिबा.. वो कहानी जो प्रेम को अमर कर गयी

मिर्ज़ा-साहिबा .. वो कहानी जो प्रेम को अमर कर गयी  

 

गहरे दर्द जुदाइयों के, शोले जैसी जान
कोई लाल चिंगारी इश्क़ दी, फिर अग्ग लगे आसमान..

मिर्ज़ा ने कई दफ़े देखा था उसे, संग-साथ बचपन का जो बीता था उसने कब जाना की साहिबा इतनी ख़ूबसूरत हो गयी है। बाज़ार में खड़ी सौदा लेती, एक हाथ से बार-बार मुंह पर आती लट को पीछे करती हुई अपनी धानी फुलकारी के दुप्पटे में साहिबा पर उसकी नज़र बस थम के रह गयी थी। उस एक पल में उसने जान लिया था कि उसको आँखों की नेमत क्यों मिली थी। उन आँखों से जो शहद उसने चख लिया था वही तो इश्क़ था।

वह भागा तेज़ कदमों से घर की तरफ़, उसका घोड़ा समझ न पाया कि मिर्ज़ा उसको वहीँ छोड़ कहाँ जा रहा है बेतहाशा। मिर्ज़ा भागता-भागता घर पहुँचा और दौड़ता हुआ छत पर जा खड़ा हो गया। डूबते सूरज की रौशनी में उसे चाँद को देखना था। अपनी धौंकनी सी चलती साँसों पर काबू पाया उसने, और आँखों से बह आये पानी को आस्तीन से पोंछा। आँखों से हाथ हटते ही उसने देखा साहिबा को आते, उस जैसी सुन्दर लड़की उस इलाके में कोई न थी, लोग उसे मुड़-मुड़ कर देखते। औरत-मर्द, बूढ़े-बच्चे सब उसे देख रुक जाते थे।
साहिबा ने उसकी तरफ़ देखा उसी नज़र से जिसमें छिपी होती है नई उम्र की मासूमियत, और मिर्ज़ा ने उसे देखा पूरी कायनात की मोहब्बत उन दो आँखों में समेटकर। साहिबा की आँखों से दो मोती गिरे और मिर्ज़ा की आँखों से बरसात हुई।

बोल के सूरज निगले
आग का पौधा निगले
सुन तेरी दास्तान ओ मिर्ज्या..

इस दास्ताँ की खुश्बू में पूरा पिंड भीग गया लेकिन उसकी आंच साहिबा के बाप और भाइयों को न पिघला सकी। मिर्जा अपने पिंड भेज दिया गया और साहिबा उसकी याद में काजल से रतजगों की कहानियाँ लिखती। बिना कहे-बताये दोनों के दिल एक ही सुर में धड़कते। इक सुबह करमू ख़बर लाया कि साहिबा की डोली आज तारों संग उठ जानी है। अपने बाप से साहिबा संग वापिस आने का वादा कर मिर्जा चल निकला।

जानी-पहचानी गलियाँ पर कर वह उस घर के सामने आ रुका जहाँ बारात आ चुकी थी, ढोल की थाप, तुम्बे की धुन, गीत के बोल और कहकहों की आवाज़ में साहिबा की सिसकियाँ दब गई थी। वह छिपते हुए घर में पहुँचा और साहिबा के कमरे तक आया। लाल जोड़े में, हथेलियों में कच्ची मेहँदी की ललाई समेटे जमीन पर साहिबा पड़ी हुई थी। उसने देखा अपनी दुल्हन को नज़र भर के, ऐसी सोहणी तो पहले कभी न लगी थी वो।

गोल गोल घुमे ज़मीन
आवे न जावे कहीं
तेरे फेरे लेवे ज़मीन
ओ मिर्ज्या…

पिंड से बहुत दूर आ चुके थे दोनों मिर्ज़ा थक गया था और उसकी गोद में सर रखे सो रहा था। उसके कभी न चूकने वाले तीर और फुर्तीला घोड़ा सब आराम कर रहे थे। साहिबा, अपने भाइयों और बाप की लाडली साहिबा, मिर्ज़ा की जान साहिबा, सोते हुए मिर्ज़ा को प्यार से देख रही थी और एक-एक कर तीरों के आधे टुकड़े कर रही थी। अब तो सब मान ही जायेंगे, इन तीरों की क्या ज़रूरत।

अचानक घोड़ा तेज़ हीसा, मिर्ज़ा की आँख खुली, उसने देखा तलवारों और तीरों की नोक पर गुस्सा लपेटे हुए आते लोगों की भीड़। वह उठ खड़ा हुआ कि आज उसे कौन रोकेगा, साहिबा उसके साथ है अब। अपने टूटे हुए तीरों को देखने भर में ही वे लोग आ गए और मुड़ के देखने तक एक तीर की नोक उसे गले में आ धँसी थी…. साहिबा ये तूने क्या किया मिर्ज़ा की नजर ने पूछा और साहिबा ने बाप को उसी नजर से देखा। साहिबा लिपट गयी मिर्ज़ा से, उसे छिपाने की कोशिश में, दूसरा तीर दोनों को बींध गया।

वहाँ इश्क़ रोया था बहुत उस रोज़ और कहते हैं उन आँसुओं से कई मिर्ज़ा और कई साहिबा जन्मे

ये वादियाँ दूधिया कोहरे की इनमें सदियाँ बहती हैं
मरता नहीं ये इश्क ओ मिर्ज़ा सदियों साहिबा रहती हैं….

 

 

upasna उपासना झा

https://www.facebook.com/upasana.jha

लेखिका मूलतः समस्तीपुर, बिहार से हैं, वर्तमान में लखनऊ में हैं| Times Of India में काम कर चुकी हैं|

लिखना, पढ़ना और घूमना पसंद हैं|

2 Comments on “मिर्ज़ा-साहिबा.. वो कहानी जो प्रेम को अमर कर गयी

  • आप कितनी भी मिर्जा जट गा लें ,,, साहिबा की बेवफाई को नकारें ,,, लेकिन सच तो ये हैं कि साहिबा ने यार मरवा दिया 😢…. ओ साहिबा दिती यार मरवा

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