ग्लोबल गुमटी

आप क्यूँ चले गए निर्मल?

डायरी में बंद इक सवाल 

“मुझे तब लगा था – जैसे हम एक ऊंचाई को छू कर नीचे उतर रहे हैं…वह अब नहीं थी, लेकिन उसकी चकराहट बाकी थी… पगडंडी के अगले मोड़ पर पहुंचकर पहाड़ी खुल गई थी…और तब सहसा समूचा प्राग हमारे पैरों के नीचे चला आया था – हजारों रोशनियों में झिलमिलाता हुआ। वल्तावा के पुल धुंध और चांदनी में घुल रहे थे। सेंट निकलस का हरा गुंबद बीच में एक जगमगाता द्वीप सा जान पड़ता था। दूर परे फ़ैली थी बर्फ से ढकी प्राग की सफेद ऊंची-नीची छतें।”

एक टीनेजर ने ऐसी कई लाइनों में ही वियना,प्राग, सोल्सबर्ग जैसे ईस्टर्न यूरोप के पुराने कई शहर देखे थे। ‘वे दिन’ के पन्ने पलटते हुए महसूस करता था कि प्राग शहर की एक गली छोड़कर दूसरी गली में प्रवेश कर रहा हो। पन्नों पर छपे अक्षरों को छू कर प्राग की गर्मी, सर्दी, पतझड़ सबको अपनी उंगलियों के पोरों पर महसूस करता था। सोचता था कभी आपसे मिलकर आपके मुंह से ही यूरोप के किस्से सुनेगा। आपके साथ मंद पीली रोशनी वाले उनींदा से प्राग के बारों में स्लीबवीत्से और कोन्याक के घूंट भरेगा। उस लड़के ने एक पतली सी डायरी खरीदी थी। उसमें यह सब पल दर्ज कर लेना चाहता था। उन पलों की इंतजार में उस डायरी को कोरा रख छोड़ा था। ‘अंतिम अरण्य’ पढ़कर डरा भी था, क्योंकि तब तक आप को इतना जान समझ गया था कि आप किसी मेहरा साहब की स्मृतियों का नोट्स नहीं ले रहे थे। वह आपका अंतिम अरण्य था-आपके अपने जीवन को स्मृतियों के रूप में एक किताब के अंदर धूसर रंग में टांक देने की कोशिश।

फिर 25 अक्टूबर 2005 को शाम में एक दूसरे टीनएजर लड़के ने फोन कर उसे बताया – “निर्मल चले गए।” इस लड़के ने चुपचाप वह डायरी खोली कवर के अंदरूनी हिस्से पर लिखा – “आप क्यों चले गए? क्या अंतिम अरण्य पूरा हुआ?” और पन्नों को कोरा ही छोड़कर वह डायरी हमेशा के लिए बंद कर दी। पर वह सवाल आज 25 अक्टूबर 2016 को भी आंखों के सामने खुला हुआ है – “आप क्यों चले गए?”

निशीथ सिंह 

 

3 Comments on “आप क्यूँ चले गए निर्मल?

Leave a reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

आपकी भागीदारी