ग्लोबल गुमटी

अल्मोड़ा

पता है, आज यह चिट्ठी कहाँ आकर लिख रही हूँ??

पहाड़ को प्रेमपत्र

पता है, आज यह चिट्ठी कहाँ आकर लिख रही हूँ?? अल्मोड़ा. वहीं जहाँ तुम मुझे छोड़कर आगे के लिए बढ़ गए थे। इस बीच वो सारे पहाड़ घूम चुकी हूँ जिनके नाम मेरी हथेली पकड़कर मेरी उंगलियों पर गिनाते समय तुम्हारी आँखें चमकती रहती थीं। तुम अपनी रौ में कसौली, नैनीताल, धरमपुर, कुल्लू सब नाम बताते रहते थे और तुमने कभी ये नहीं देखा कि उस समय मेरे लिए ये पहाड़ नहीं बस तुम्हारी आवाज में तुम्हारे शब्द हुआ करते थे जिन्हें मैं अपना हाथ तुम्हारे हाथ में होने की पुलक से भरी, मुग्ध सी मुस्कराती,  मेरी हथेली को मैप समझ उसमें खोये तुम्हारे चेहरे को देखती हुई बेख्याली में सुनती रहती थी। मुझे बस ध्यान रहता था कि पहाड़ों के बारे में बताते समय तुम्हारा चेहरा एक बच्चे जैसा दिखता था जो अपने खिलौने गिन रहा हो।

बाईस साल बाद अल्मोड़ा को देखकर मैं एक बार तो पहचान ही नहीं पायी कि ये वही अल्मोड़ा है। मुझे लगा गलती से कहीं और उतर गयी हूँ, बस के कंडक्टर से पूछा तो उसने बताया कि अल्मोड़ा बस स्टैंड तो यही है, अगर आपको आगे जाना हो तो बस बदलकर जाना पड़ेगा। मुझे कहाँ आगे जाना था, आगे तो तुम्हे जाना था और तुम चले गए, देखा जाए तो मुझे तो कहीं भी नहीं जाना था।मैं तो बस तुम्हारे साथ यहाँ तक चली आयी थी।

अब तो यहाँ पूरा शहर बस गया है, चमचमाते शोरूम, मॉल्स, थियेटर्स देखके पहले तो घबराहट सी होने लगी फिर जब शाम को टहलने निकली तो बाईस साल पुराना अल्मोड़ा धीरे धीरे किस्तों में मेरे सामने खुलने लगा और हम दोनों एक दुसरे को पहचानने लगे। बस स्टैंड से ऊपर पहाड़ी की तरफ जाने वाले रास्ते के किनारे पानी का वो सोता आज भी है, बस अब वहां का पानी सड़क के ऊपर से बह के पार नहीं होता, उसके लिए सीमेंट की नाली बना दी गयी है। चीड़ के पेड़ अब कितने कम हो गए हैं। लोगों ने बताया कि दो साल पहले बादल फटने से हजारों पेड़ बह गए और अब उनकी जगह पे नए पेड़ सरकार ने लगवाए हैं।

फिर एक शाम व्हिस्टलिंग वुड्स कॉटेज का रास्ता पूछती निकली, अधिकाँश लोगों को इसके बारे में कुछ पता नहीं था। फिर एक चाय की दूकान पर बैठे बूढ़े ने कहा कि शायद आप लालकोठी का पता पूछ रही हैं। मुझे तब याद आया कि तुमने पहाड़ी की चोटी पे अकेले खड़े लाल ईंटों वाले बंगले को देख के बोला था-” द रेड ब्रिक्स स्ट्रक्चर ऑफ कोलोनियल नॉस्टेलजिया।” वहां किससे मिलना है आपको, वहां तो सालों से कोई नहीं रहता शायद, बूढ़े ने पूछा था। जी वहां किसी से मिलने नहीं जाना बस उसके कुछ फोटोग्राफ्स लेने हैं एक मैगजीन के लिए।

असल में उस व्हिस्लिंग वुड्स कॉटेज की बगल से जाती एक पहाड़ी पगडंडी पे इन्तजार कर रही बाईस साल पुरानी मैं से मिलने जाना है का सच बताकर उस पहाड़ी बूढ़े को उलझन में डालने या खुद पर पागल होने का संदेह पैदा करने की जगह मैंने एक झूठा कारण बताकर और रास्ते का पता लेकर वहां से आगे निकल लेना ज्यादा बेहतर समझा।

मेन रोड को छोड़कर थोड़ा ऊपर चढ़ने पर चीड़ के एक जंगल को पार करने के बाद मुझे वो मिल गयी। वो पगडंडी जिसपे 1988 के ढलते जून की एक गर्म दोपहर को हम दोनों अंतिम बार साथ चले थे। उस दोपहर के बाद कॉफी हाउस, पीतमपुरा और आर्ट्स फैकल्टी में हम तीन चार बार और मिले जरूर थे पर सिर्फ मिले थे, साथ हम अंतिम बार इसी पगडंडी पर चले थे।

व्हिस्लिंग वुड्स कॉटेज की ऊंची काली चिमनी दिखने तक तो मैं किसी तरह हांफती हुई तुम्हारे पीछे भागती रही पर उसके बाद धम्म से एक पत्थर पर बैठ गयी। “सुनो!” मैंने दसेक मीटर आगे निकल चुके तुम्हे आवाज दी। तुम रुके और पीछे मुड़े “क्या हुआ? आओ न जल्दी”

“मुझे लगता है मेरे पैर में मोच आ गयी है। मैं और नहीं चल सकती।”

तुम वापस आये। “कहाँ?दिखाओ तो।”

मैंने दर्द का भाव चेहरे पर लाने की भरपूर एक्टिंग करते हुए जल्दी से अपनी एक ऐड़ी आगे कर दी।

“लो तब तक तुम पानी पियो, मैं देखता हूँ।” अपने गले से थर्मस निकाल, मुझे देकर तुमने नीचे बैठकर मेरी एड़ी उठाकर अपने घुटनों पर रख लिए और किसी एक्सपर्ट डॉक्टरों वाली गंभीरता लेकर गौर से देखने लगे । “कुछ नहीं मामूली सा स्ट्रेन है, थोड़ी फिजियोथेरेपी से अभी ठीक हो जाएगा।”

अंगरेजी के कुछ टेक्नीकल शब्द बोलकर अपने को हर विषय का जानकार दिखाने की तुम्हारी आदत मुझे बहुत पसंद थी और उस समय भी मेरे पैरों को कभी दायें-बाएं कभी ऊपर-नीचे घुमाते तुम्हारी तन्मयता पर मुझे बहुत दुलार आ रहा था। अचानक तुम्हारे हाथ से मेरे पैरों की एक उंगली जरा ज्यादा जोर से खींच गयी और मेरे मुंह से चीख निकल गयी।

तुमने सर उठाकर मुझे देखा, मेरी आँखों में आंसू आ गए थे, तुम्हारा चेहरा फक्क पड़ गया। “ज्यादा दर्द हो गया क्या सिंधु?” मुझे बस एक पल की चिहुंक आयी थी पर तुम्हारा वो परेशान भौचक्का चेहरा देखके मुझे अंदर से बहुत जोर की हंसी आ गयी। विहित राय का वो चेहरा। इंग्लिश लिटरेचर में कॉलेज का टॉपर विहित राय, प्रोफ़ेसर मुखर्जी का फेवरिट स्टूडेंट, जिसके बारे में सब कहते थे कि ये अपने फर्स्ट एटेम्पट में आईएएस क्लीयर करेगा वो भी रैंक के साथ, पर जो खुद इण्डिया में प्रोगेसिव राइटिंग का अगला मुल्कराज आनंद बनना चाहता था।

मेरे पैर अपने हाथों में पकड़कर, अपने घुटनों पर रखे उस विहित राय का पसीने से भीगा बौखलाया फक्क चेहरा मुझे आज तक नहीं भूलता। ऐसा लग रहा था कि अगर थोड़ी और देर मैंने ये नाटक किया तो तुम रो पड़ोगे।मैं थोड़ी देर और तुम्हारी बौखलाहट का मजा लेना चाहती थी पर तुम्हारी हालत देखकर मुझे तुमपर दया आ गयी और इतनी देर से दबाकर अंदर रखी हंसी ठठाकर बाहर आ गयी। तुम कन्फ्यूज्ड से मेरी आँखों में देखते रहे।

मैं हँसते हुए ही अपनी जीन्स झाड़ती उठी और तुम्हारी ठुड्डी पकड़कर तुम्हे खड़ा किया – चलो अब आगे बढ़ें तुम्हारी पर्पल फूलों वाली ब्रिटिश सीमीट्री देखने।” मैंने हँसते हुए ही कहा। तुम चुपचाप आगे आगे चल दिए। फिर उसके बाद तुमने पूरे रास्ते मेरे सवालों के जवाब में हूँ-हाँ के अलावा ज्यादा कुछ नहीं बोला। पर आधे घंटे चलने के बाद सीमिट्री के गेट पे पहुँचते हीं तुम्हारा बच्चों वाला उत्साह वापस आ गया। तुम जैसे भूल गए कि पीछे मैं भी आ रही हूँ लगभग दौड़ते हुए अंदर घुस गए।

मैं गेट पर पहुँची और उसे ध्यान से देखा। वो सिर्फ नाम का दरवाजा था क्योंकि उसके दोनों तरफ की दीवारें कब की ढह चुकी थीं और उसकी बगल से भी सेमेट्री में दाखिल हुआ जा सकता था। पुरानी ईंटों के बने इस दरवाजे की दीवार काफी मोटी थी, एक मीटर से कुछ ज्यादा ही रही होगी। उसपे न जाने कितने दशकों ने काई बो दी थी। ऊपर फर्न के कई पौधे जन्म लेकर अपनी उमर गुजारकर मर भी चुके थे और कई और जंगली पौधे भी उग आये थे जो लगता था कुछ वर्षों में इस बूढ़े दरवाजे की दरारों में अपने लिए और अधिक हिस्से की मांग में इसे और झुका देंगे।

पर फिलहाल ये थका बूढा दरवाजा अकेला खड़ा था, मृत्यु के इस सायबान में स्वागत करते लाचार, कमजोर चौकीदार की तरह। मैंने न जाने क्यों उस दरवाजे में से होकर गुजरते हुए उस डेढ़ कदम की दूरी को सर झुकाकर तय किया। जैसा तुमने बताया था वो एक विशाल कब्रिस्तान था जिसमे बैगनी रंग के जंगली फूल बेतहाशा खिले हुए थे। घुटनों तक ऊँचे इन फूलों ने कब्रिस्तान को इस तरह ढँक दिया था कि नजदीक जाने पर ही इनमे छिपी कब्रें नजर आती थीं वरना दूर से ये पर्पल ट्यूलिप का एक बाग़ नजर आता था। प्रकृति को सौंदर्य क्रिएशन की अपनी ताकत दिखाने के लिए क्या यही जगह मिली थी – तब मैंने सोचा था। अब सोचती हूँ तो लगता है, इससे बेहतर क्या जगह हो सकती है। प्रकृति का Floral tribute to the souls lying in its soil. तुम्हारे लिए नजर दौड़ाई तो देखा तुम दूर एकदम आखिर में बैठे हुए थे।

वहां तक पहुँची तो देखा तुम पत्थर की एक पुरानी कब्र पर बैठे थे। मैं सिहर गयी “उठो इसपर से, you are showing disrespect to them.” मैंने तुम्हारा हाथ पकड़कर तुम्हे उठाने की कोशिश करते हुए कहा।” उलटा तुमने मुझे ही खींचकर साथ बिठा लिया। “कहीं और नहीं बैठ सकते थे?” मैं झुंझलाते हुए बोली। “आगे देख रही हो? ये अनंत खाई और नजरों की पहुँच से परे ये घाटी?” तुमने मेरी बात सुनी ही नहीं थी। तुम तब तक खो चुके थे अपने पहाड़ों में, एक ट्रांस में चले गए थे, जैसा कि अक्सर होता था। और फिर मैं भी खो गयी पहाड़ों में खोये तुम्हारे चेहरे में, ये भी उतना ही अक्सर होता था। “ इस आख़िरी कब्र के पास आकर मृत्यु भी ठहर गयी।

ये मृत्यु की भी सीमा है, जैसे जीवन की सीमा सेमेट्री के उस पुराने दरवाजे तक है।” “ और उस दरवाजे की सीमा के बाद उग आये ये फूल? क्या ये जीवन नहीं हैं?” मेरे मन में सवाल आया पर उसे मैंने मन में ही मार दिया था क्योंकि जानती थी अपने ट्रांस में तुम सवाल सुनते ही नहीं। “ इस सीमा के बाद जो कुछ भी समाप्त होगा वह मृत नहीं होगा, वह बस इन पहाड़ों में कहीं विलीन हो जाएगा, अदृश्य हो जाएगा पर रहेगा जरूर, यही कहीं बचा हुआ।

Untraceable presence” तुम्हारा ट्रांस कई मिनट तक जारी रहा।

मुझे तुम्हारी पहाड़ और फिलॉसॉफी का कॉकटेल कभी समझ नहीं आती थी, जैसे मुझे तुम्हारे निर्मल वर्मा नहीं समझ आते थे जिनको तुम मुझे जबरदस्ती पढ़ाते रहते थे। पर मैंने तुमसे कभी ये बात बतायी नहीं, जानती थी मजाक ही बनाओगे मेरा। तुम अपने ट्रांस में जाने क्या क्या बोलते रहे और मैं अपने ट्रांस में तुम्हे बोलते देखती रही। फिर मेरी नजर उस कब्र पर जिसपर हम बैठे थे के पत्थर पर गयी। मुझे उसपे कुछ लिखा हुआ दिखाई दिया। अपने स्कार्फ से मैंने उसपर से पत्ते और धूल हटाई। उसपर लिखी लाइन पढ़कर मैं चौंक गयी। मैंने तुम्हारी बाँह पकड़कर तुम्हे झिंझोड़ा। तुमने मेरा चेहरे की तरफ देखा और फिर मेरी नजरों का पीछा करते हुए तुम्हारी नजरें उस लिखावट पर गयी “Victoria Duncan Leeman

12 January 1908 – 27 August1916”

इस बार तुम खुद ही वहां से उठकर खड़े हो गए। उस कब्र में एक आठ साल की बच्ची लेटी हुई थी जिसने तुम्हारी फिलॉसॉफी के अनुसार आज से 76 साल पहले उस पहाड़ी पर मृत्यु की चौहद्दी तय कर दी थी। शायद वो भी यहीं कही हो अब भी, इन्ही पहाड़ियों में – untraceably present. तब तक एक अनचीन्ही पहाड़ी के पीछे सूरज डूबने लगा था। अँधेरा धीरे धीरे उन बैगनी फूलों को कब्रों के पुराने पड़ चुके पत्थरों के रंग में रंगने लगा था। हम बाहर की तरफ चल पड़े। “रुको” कुछ कदम चलकर मैं ठहरी, घूम के वापस आयी, एक मुट्ठी बैगनी फूल नोचे और उस कब्र पर रख दिया। उसके बाद हम वापस लौट गए। लौटते समय हम व्हिस्लिंग वुड्स के सामने से गुजरे और उसके अहाते के फाटक पर लगे टीन के एक पुराने जंग लगे नेमप्लेट पर पढ़कर ही हमने उसका नाम जाना था। और व्हिस्लिंग वुड्स के नीचे लिखा था Duncan leeman. पर मैंने पढ़ा था – Untraceably present, और शायद तुमने भी।

रात में गेस्ट हाउस के कमरे में तुमने जिद करके अपना बिस्तर नीचे फर्श पर डाल लिया। हम स्कॉच के नशे में बहुत देर तक बहुत सारी चीजों पर बात करते रहे पर असल में हम दोनों जान रहे थे कि बातों के बहाने हम बस उस सेक्सुअल टेंशन को टाल रहे थे जो हमारे स्त्री पुरुष मनों से निकल कर उस कमरे में पसर आयी थी। मैं मन में ये सोच रही थी कि क्यों नहीं तुम आकर मेरा हाथ पकड़ लेते हो, क्यों नहीं बिस्तर पर बगल में बैठकर पास आकर मेरे कंधे से थोडा ऊपर फुसफुसाकर एक बार मेरा नाम भर बोल देते हो बस फुसफुसाकर बोला गया वो एक शब्द ही काफी होता एक बेहद कमजोर निर्णय पर खड़ी उस अनिच्छुक दीवार को भहराकर गिरा देने के लिए। रात में मैंने एक बार तुम्हे आवाज भी दी थी कांपती और मेरे नियंत्रण से बाहर आवाज में “ विहित तुम्हे नीचे ठण्ड लग रही होगी, ऊपर ही आ जाओ।” तुमने बस इतना कहा “नहीं ठीक हूँ।”

पता नहीं मेरा भ्रम था या सच पर मुझे लगा था कि तुम्हारी भी आवाज काँपी थी। पर अब सोचती हूँ तो लगता है हमने उस दिन अच्छा किया जो रात भर एक कमजोर दीवार को दोनों तरफ से सहारा देकर गिरने से रोके रखा। उस रात का अधूरापन ही बचा रह गया मेरे तुम्हारे बीच में सब खत्म होने के बाद। यह अधूरापन ही था कि फेसबुक पर आने के बाद मैंने तुम्हे खोज लिया, वैसे तुम्हारे घर का नंबर भी इतने दिनों से मेरे पास था पर तुमसे बात करके मेरे बारे में अपडेट कर देने का सुख मैं तुम्हे नहीं देना चाहती थी, अब भी नहीं चाहती। जब तुम मेरे बाल हल्के से खींच देते थे और दर्द और गुस्से से मेरे चीखने पर तुम हंसकर कहते थे न कि ये तुम्हारा सैडिस्ट प्लेजर है, इसी तरह ये मेरा सैडिस्ट प्लेजर है विहित राय। और बताती हूँ क्यों।

उस रात की अगली सुबह गेस्ट हाउस के केयरटेकर ने कमरे का दरवाजा खटखटाकर बोला कि रिसेप्शन पर मेरे लिए दिल्ली से फोन है। मैं फोन अटेंड करके वापस आयी तब तक तुम भी जाग चुके थे। मैंने तुम्हे बताया कि हॉस्टल की वार्डन का फोन आया था, उनके पास घर से फोन आया था कि नानी की तबियत बहुत ख़राब है और मुझे तुरंत कानपुर बुलाया गया था। “पर हम कौसानी और शायद उससे भी आगे जाने वाले थे।”

“हाँ पर अब लौटना होगा। हम अगली बार……”

“ठीक है कब निकलोगी?” तुमने मेरी बात बीच में ही काटकर कहा। मैंने गौर से तुम्हारे चेहरे को देखा। एकदम सपाट! एकदम पहाड़। अंदर कुछ दरक गया। मैं एक मिनट के लिए एकदम निःशब्द हो गयी। कोई इतना indifferent कैसे हो सकता है। कम से कम एक एक्सप्रेसन तो मैं डिसर्व करती ही थी। एक पतली सी शिकन भी नहीं? हम साथ आये थे और तुम कह रहे थे मुझे अकेले लौटना है। तब भी नहीं? ये डिटैचमेंट का इशारा था या इस बात का रियलाइजेशन कि कभी कुछ अटैच्ड था ही नहीं? तो क्या मैं अकेली ही इतना आगे बढ़ आयी थी? और तुम शुरू से अब तक वैसे ही थे indifferent. मैं क्या थी फिर? बस एक कंपनी? जो कोई भी हो सकता था। तुम उसकी भी एड़ी उठाकर अपनी गोद में रख सकते थे और उसके चिहुंकने से बौखला जाते? ठीक है कि हमारे बीच कुछ भी शब्दों में नहीं उतरा था, तो क्या वो कुछ था ही नहीं? तुम्हारे indifference को इन दो सालों में मैं ही अपनी बचकानी रुमानियत में अपने हिसाब से गलत पढ़ती रही?

“अभी, इसी वक्त” बोलने में मुझे बहुत मेहनत लगी। गले में कुछ फंस रहा था।

“ठीक है मैं बस का पता करके आता हूँ तुम तब तक पैकिंग कर लो।”

जाते समय तुम दरवाजे पर रुके “अब मेरा भी मन नहीं लगेगा यहाँ, मैं भी अभी ही निकल जाऊँगा।” बोलकर तुम बाहर चले गए और मैं सोचती रह गयी कि इस बात का क्या मतलब था।

फिर तुम चले गए, आगे के लिए। तुम्हारी बस आधे घंटे पहले थी। जाते समय तुमने हग किया, पर उसमें मैं नहीं थी। आधी बाँहों का वो घेरा मेरे लिए अब कुछ नहीं था। तुम्हारी बस चली गयी और मैं बस स्टैंड पर खड़ी तुम्हारी बस को जाते और खिड़की से सर निकालकर तुम्हारा हाथ हिलाना देखती रही। मेरे अंदर कोई भाव नहीं आ रहा था, पर मेरा मन रोने का कर रहा था। बेवजह, कम से कम तुम्हारा चले जाना तो वजह नहीं ही थी।

तुम अकेले चले गए थे और मेरे अंदर एक हिंसक खुशी जागती है जानकर कि तुम अकेले ही रह गए। तुम आज भी अकेले हो। तीन दिन से देख रही हूँ तुम्हारी कमरे की लाइट रात भर जलती रहती है। तुम्हारी खिड़की गेस्ट हाउस के मेरे कमरे की बालकनी के सामने पड़ती है। ये फेसबुक सबकुछ बता देता है न। यहाँ आकर अल्मोड़ा यूनिवर्सिटी में अंगरेजी के प्रोफ़ेसर विहित राय का घर पता करना और उसके पास में गेस्ट हाउस लेना जरा भी मुश्किल नहीं रहा मेरे लिए। पर मैं मिलूंगी नहीं तुमसे, कभी नहीं। ये चिट्ठी तुम्हारे बिल्डिंग के वाचमैन को देकर कल चली जाउंगी अल्मोड़ा से। पता नहीं इससे क्या मिलेगा। शायद एक सैडिस्ट प्लेजर।

अब तुम्हारे बारे में सोचती हूँ तो लगता है कि पहाड़ों को प्यार करते करते तुम खुद पहाड़ हो गए। पर नहीं!तुमने बताया था कि पहाड़ भी ज़िंदा और मुर्दा होते हैं। तुम इन दोनों में से भी कुछ नहीं। तुम असल में पहाड़ की उस पुरानी सिमेट्री की कब्र का पत्थर हो। आस पास बेतहाशा बैगनी फूलों से घिरे होने पर भी तुम पर कभी काई छोड़कर कुछ नहीं जम सकता। तुम वही हो, तुम वहीं पे हो indifferent और Untraceably present.

सिंधु शर्मा,

21.06.2010

7 Comments on “पता है, आज यह चिट्ठी कहाँ आकर लिख रही हूँ??

Leave a reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

आपकी भागीदारी