ग्लोबल गुमटी

डायरी

पर डायरी, मेरी आखिरी विश जानती हो क्या है?

पर डायरी, मेरी आखिरी विश जानती हो क्या है?

 

डियर डायरी 

पता है क्या हुआ आज ? मेरे कमरे में आकर माँ पापा मेरे पास बहुत देर तक बैठे रहे। पापा मेरी फेवरिट आइसक्रीम लेकर आये थे और हम सबने बैठकर तब तक बातें की जब तक मैं थक नहीं गयी।याद है भाई को सिनेमा हॉल के बाहर हम भूल गये थे और वो इंटरवेल तक बाहर बैठा रोता रहा।बेचारा।हम आज वो दिन याद कर बहुत देर तक हँसते रहे।

फिर मुझसे कँपकँपाती आवाज में पूछा गया कि मैं क्या करना चाहती हूँ।ये कहने का तरीका था कि मेरी आखिरी विश क्या है?जानती हूँ कि माँ की आँखों में आँसू थे और सब नार्मल बनने की कोशिश कर रहे थे।मैंने नींद का बहाना बना कर सबको भेज दिया और आज मुझे तुमसे यही बात करना है कि मेरी आखिरी विश क्या है।

जब कैंसर का पहली बार पता चला था तब बहुत डर गयी थी, तुमको लिखते वक्त कितना रोयी भी थी। आपको पता चल जाये कि आपको कब और कैसे जाना है तो हर दिन बीत जाने के दहशत में गुजरता है। मैं सबके सामने स्ट्रांग बनती हूँ पर सच बताएँ डायरी, देखो सच्चाई तो यह है कि कोई भी तैयार नहीं होता किसी भी आखिरी के लिये।

विश-क्या विश भी कभी पहली और आखिरी हो सकती है? आज तुमसे बात कर रही हूं तो सारी विशेज़ का स्लाईडशो गुजरता है आंखों के सामने से।सुपर कमांडो ध्रुव से पहला प्यार,अच्छे नंबर लाने पर पापा से भी तो एक विश किया था- स्कूटी के लिये, कॉलेज की पहली आज़ादी, जेनयू का चार्म, 17 साल की उम्र में जब सिविल वार की रिपोर्टिंग देख कर रोयें खड़े हो गए थे तो एक दिन मैं भी ऐसी आवाज़ बनूँगी सोचा था।

आखिरी विश -थोड़ा पीछे चलते है, आज मुझे वो लड़का दिखता है जो ४ साल तक अपनी बाल्कनी पर आ जाता था जब भी मैं घर से बाहर निकलती।पर कभी उसने आकर मुझसे बात नहीं की और आज मैं उसे बताना चाहती हूँ कि मुझे पता था कि वो स्कूल के बाद रोज़ मेरा इंतजार करता था। मैं चाहती थी कि वो मुझसे कभी तो बात करे, कुछ किस्से बिना कुछ कहे ही खत्म हो जाते हैं ना और शायद इसीलिए एक भीनी याद दे जाते हैं, कोई कड़वाहट नहीं।

पहला किस और उसके बाद की झिझक भी आज याद आ रही है।वो लड़का याद है जिसने मेरे लिये कविता लिखी थी, कविता बकवास थी पर मैंने उसे छिपकर न जाने कितने बार पढ़ा । फिर एक वक़्त ऐसा आया जब मैंने प्यार भी किया, उसके साथ एक लम्बी ज़िन्दगी की विश भी की,बच्चों के नाम तक सोच लिया, फिर एक दिन उसे तब जाते हुये देखा जब मुझे उसकी सबसे ज्यादा जरुरत थी तब भी तो  विश किया था, ……………आखिरी विश …आज सोचती हूँ कि मेरी आखिरी विश में वो किस, वो कविता और उसका लौट कर आना भी तो होना चाहिये न।

जब किसी का समय लिमिटेड हो ही जाता है तो आखिरी विश जैसा मज़ाक क्यूँ , क्या कभी भी कोई विश आखिरी हो सकती है . क्या आपने कभी सोचा है कि हम जब “ बकेट लिस्ट “ के बारे में जानते भी नहीं हैं,उस उम्र में भी हमारी बकेट लबालब भरी हुई होती है. कोई दुनिया घूमना चाहता है, कोई अपनों के साथ समय बिताना, कोई अपने उस जूनून को फ़ास्ट फॉरवर्ड में पूरा कर लेना चाहता है जिसे कभी नौकरी- चाकरी के फेर में पीछे छोड़ दिया था, कोई कुछ करना चाहता है तो कोई कुछ और.और मेरी आखिरी विश? कितना कुछ तो करना था अभी.

पर सोचती हूँ कि इन आखिरी विश के पीछे भी मेरी एक तलाश है- एक अदद ज़िन्दगी की, अघाने तक लम्बी ज़िन्दगी की. मुझे दुनिया घूमना है और वो भी पूरी दुनिया इत्मीनान से, खाते पीते, लोगों से गप्पे मारते  घूमना है, मुझे दौड़ना नहीं है. जो मुझे बिना किसी शर्त के प्यार करते हैं मुझे उनके साथ रहना है और एक लम्बा समय बिताना है । मेरा सबसे बड़ा डर अलग होने का है और क्या “आखिरी” शब्द अलग होने के डर का ही चेहरा नहीं है. मुझे तो अभी जाना था छोटे शहरों में, गुलमर्ग की गालियों में ढूँढने अपनी कहानियाँ, मैक्लियोडगंज के उस मौंक से मिलने जिसने बियर पर बुद्ध के बारे में बताया था, गाँव लौट कर किताब लिखना था और बस चलना था बिना किसी ब्रेक के, बिना कहीं ठहरे। पर ये आखिरी विश।

जिस मन को सपने देखने की आदत  सी होती है- उसे बोल दिया जाता है कि देख अबकी बार आखिरी विश है. इसके बाद कुछ नहीं.तो पता है क्या याद आता है– स्कूल के वो कमीने दोस्त, बारिश में जानबूझकर भीगना, माँ पापा का प्यार, नानी घर के आम, वो अपने नाम के साथ इंग्लिश की टीचर का नाम लिखना और बीच में दिल बनाना, वो पहला क्रश, पहला प्यार और फिर दिल का पहली बार टूटना, वो छिप के पहली सिगरेट , ब्लू फिल्म की पहली झलक और सोचना इसे ब्लू फिल्म क्यों कहते हैं, बड़े बड़े करियर गोल्स, कुछ सपनों का अधूरा रह जाना, कुछ रिश्तों का बिखर जाना और इस कभी न ख़त्म होने वाले फ्लैशबैक में ढून्ढ के निकालो अपनी आखिरी विश.

स्टीव जॉब्स ने अपनी आत्मकथा लिखने वाले लेखक से कहा था “क्या तुम जानते हो मैंने मैकबुक में पॉवर ऑफ का कोई फंक्शन क्यूँ नहीं रखा, क्यूंकि पॉवर ऑफ का मतलब ख़त्म हो जाना होता है और ख़त्म हो जाने से ज्यादा डरावना कुछ नहीं” . 

आखिरी विश भी उस ख़त्म हो जाने जैसा है , उसके आगे कुछ नहीं।

पर डायरी, मेरी आखिरी विश जानती हो क्या है?

मेरी आखिरी विश है कि मैं जीना चाहती हूँ।

ढेर सारा प्यार

तुम्हारी दोस्त

(नोट:अपनी दोस्त सुमेधा गुलाटी को सोच कर ये आर्टिकल लिखा है मैंने। बहुत कम लोग हैं जो बिना शर्तों के प्यार करते हैं मुझसे और वे इसे पढ़कर डर गया, परेशान हो गये, कॉल कर खूब डाँटा। वे हैं तो जिंदगी खूबसूरत है )

डॉ. पूजा त्रिपाठी 

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