ग्लोबल गुमटी

जिसका कोई नहीं, उसका तो खुदा है यारों

एक बड़ा मशहूर गीत है कि जिसका कोई नहीं, उसका तो खुदा है यारों..हाँ, इस दुनिया में सबको सब कुछ भले न नसीब हो पर कभी कभी कुछ ऐसा दिख जाता है जिससे मन को संतोष मिलता है कि इंसानियत अभी जिंदा है.

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अच्छा आप बताइए एक पुलिसवाले के लिए आपके मन में पहला ख्याल क्या आता है. यही न कि वो भ्रष्ट होगा, रिश्वत लेता होगा, गाली गलौच देता होगा. जी, हमारे और आपके मन में एक पुलिसवाले की शायद ऐसी ही तस्वीर उभरती है. पर इन्हीं तस्वीरों के बीच में से हम आपके लिए लेके आयें हैं कुछ ऐसा जिसे देख आपको अपना नजरिया बदलने पर मजबूर होना होगा. फिर शायद आप भी सोच पायेंगे कि चमचमाती वर्दी, और रौबदार चेहरे के पीछे एक मासूम सा दिल होता है जो धडकता है हमारे आपके लिए, इंसानियत के लिए.

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आइये आपको ले के चलते हैं बिहार. सड़क पर आपने अक्सर कूड़ा बीनते छोटे छोटे बच्चों को तो देखा ही होगा या शायद देख के भी अनदेखा कर दिया होगा. वो बच्चे आखिर कौन होते हैं, उनकी क्या मजबूरी है कि वो कूड़ा बीनते हैं ये सब जानने में हम आप कभी भी दिलचस्पी नहीं लेते और आँखें मूँद अपनी राह गुज़र जाते हैं. पर जरा रुकिए, यहाँ बिहार के पूर्णिया जिले में कोई है जिसने आँखें नहीं मूंदी, जिसने मुहं नहीं मोड़ा. क्या आप जानते हैं वो कौन हैं? जी, ये है बिहार पुलिस.

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जिनके कन्धों पर कानून संभालने की जिम्मेदारी होती है, उन्होंने अब एक और जिम्मेदारी उठाई है और वो भी खुद से. हाँ, बिहार की पूर्णिया जिले की पुलिस ने कूड़ा बीनने वाले, बेहद कमजोर, अनाथ और बेसहारा बच्चों को पढ़ाने का अभियान छेड़ रखा है. अब अगर आप ये पूछें कि इन गरीब बच्चों की क्लास के लिए क्या कोई स्कूल बनवाया गया है तो जान लीजिये कि ऐसा नहीं है. इन पुलिसवालों को जहाँ और जब मौका मिल रहा है वो इन बच्चों को पढ़ाने में लग जा रहा है, फिर चाहे वो रेलवे स्टेशन हो या सड़क की लालबत्ती.

इतना ही नहीं, इन बच्चों को पुलिसवाले मुफ्त किताब, कॉपी, और कपडे भी मुहैया करा रहें हैं. कूड़ा बीनने वाली तसलीमा से जब ग्लोबल गुमटी  ने बात की तो उसने बताया कि वो बड़ी होकर पुलिस सेवा में जाना चाहती है.

12 साल का सुरेश जिसके माँ बाप किसी हादसे में गुजर गए एक ढाबे पर काम करता था, पुलिसवालों ने उसे वहां से ले आकर थाने में ही एक जगह दे दी है और एक स्कूल में उसका नाम भी लिखा दिया है. हर शाम को थाने का कोई न कोई सिपाही सुरेश को पढ़ा देता है जिससे उसे कोचिंग की जरूरत नहीं पड़ती.

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पूर्णिया जिले की पुलिस के इस काम की चर्चा अब धीरे धीरे पूरे बिहार में है, बहुत सारे लोग इस छोटे से प्रयास को महाभियान में बदल देना चाहते है. कई सारे संगठन और बड़े आलाधिकारी भी इस मुहिम को आगे बढ़ा रहें हैं.

यकीनन ये कार्य दिल को छू लेना वाला है, ये सिर्फ सुरेश या तसलीमा के नसीब को बदलना भर नहीं है, ये बदलना है इस देश के नसीब का, आने वाले कल का, आइये इस्तकबाल करें बिहार के पूर्णिया पुलिस का.

जय हिन्द

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