ग्लोबल गुमटी

बिना पाउडर प्राईम टाईम से अलग रविश जी को देखिये, वो चमक नही रहती

पाउडर” लगाते हैँ आप?

“पाउडर” लगाते हैँ आप? या तो लगाते होँगेँ या कभी जरूर लगाया होगा।पाउडर का महत्व और प्रयोग आदिकाल से होता आ रहा है। देवोँ के देव महादेव को भी भस्म रूपी पाउडर लगाना प्रिय रहा है। जी हाँ सौँदर्य प्रसाधनोँ मेँ लिपस्टिक,बिँदिया, पाउडर,क्रीम,मेँहदी और नेलपॉलिस जैसे प्रसाधनोँ के बीच पाउडर और क्रीम ही दो ऐसे लिँगनिरपेक्ष प्रसाधन हैँ जिनका प्रयोग पुरूष भी खुब करते हैँ।

यहाँ बात पाउडर की कर रहा हूँ। याद आता है बचपन जब शाम के चार बजते ही हम जैसे खेलने को बाहर जाने को होते माँ दौड़ के पाउडर का डिब्बा ले के आती और बेटा घर के बाहर धुल मेँ लोटने खेलने के बाद भी सुँदर दिखे इसके लिए पाउडर पोत के बाहर भेजती थी। पाउडर लगवाना भी एक कड़ा पल होता था बच्चोँ के लिए।हम बिना पाउडर लगवाये जल्दी खेलने जाने को भागते कि मौसी धर के दोनोँ हाथ पकड़ती,नानी टाँग पकड़े है,माँ एक हाथ से मेरा लंबा झोँटा पकड़े होती और दुसरे हाथ से धर के गाल पर रगड़ रगड़ के पाउडर “लगाती नहीँ” बल्कि “घसती” थी। हम बस साँस रोके आँखेँ बँद कर चेहरा ताने उस पल को झेल लेते किसी तरह। पाउडर को इस कदर रगड़ के माँ हमेँ ठीक उसी भाव से चमकाने का प्रयास करती जैसे कोई आदमी लोन से ली हुई हीरो होँडा बाइक को धो पोँछ चमतकाता है।

पाउडर इतना कि आज भी अपनी नाक मेँ गँथी वो खुशबु गई नहीँ,आज भी महसुस करता हुँ,याद करते महक जाता हुँ।पाउडर मेँ भी शायद ही कोई गाँव कस्बा या घर होगा जो “PONDS पाउडर” से ना गमका होगा। अच्छा बच्चोँ को गरगोँत के पाउडर लगाने का चलन केवल मेरे नही, हर खाते पीते घर मेँ था।आहा गाँव की मिट्टी मेँ जब पौँड्स लगाये हम लोटते तो दोनोँ की खुशबु मिल क्या नशा तैयार कर देती थी।

एक पाउडर था “नाईसिल” पाउडर। बदन मेँ घमोर घमछी होने पर ऐसा पोता जाता था जैसे दिवाली के अवसर पर दिवाल मेँ चूना पोता जाता है। घमोरी हुए एक 6 बरस के बच्चे को नंग धड़ंग पाउडर लगा के आँगन के खटिया पर ऐसे लिटा दिया जाता था जैसे भतुआ का बड़ी सुखने छोड़ा हो खटिया पर। बच्चा इस कदर गर्दन से पाँव तक पाउडरमय होता था जैसे शरीर पर भभुत लगाये भोलेनाथ की बारात का कोई मसानी भूत या पिशाच का भतीजा हो जो बारात मेँ नाचते नाचते थक के पीछे छुट गया है और अभी जनबासा मेँ खटिया पर आराम कर रहा है।

अच्छा बच्चा गोरा हो या काला हर माँ को लगता था कि पाउडर उसके लाल को सफेद कर देगा। माँओँ को लगता था कि जो बच्चा काला है वो सफेद दिखेगा और जो गोरा है वो बहुत सफेद दिखेगा। ऐसे समय मेँ जब हर तरफ काला है, दाल काला, भात काला, अफसर काला, नेता काला, खेल काला, अखबार काला, धन काला, रिश्ता काला, संत काला ऐसे मेँ सफेदी को लेके कोई इतना सजग हो सकता है तो वो बस “माँ” ही है।

अच्छा ये तो बात बच्चोँ की थी,बड़े व्यस्क मेँ भी पाउडर का चलन खुब रहा है। जिस गली मेँ “पौँड्स” गमका समझिए आज कोई बारात जाने वाला है। जी बड़ोँ मेँ पाउडर का चलन सबसे ज्यादा बाराती जाते वक्त ही था। मुझे जब भी चौधरी जी सिल्क के कुर्ता पर गर्दन पर पाव भर पाउडर लपेटे मिलते मैँ समझ जाता आज कहीँ कुटमैती या बाराती है। उनके गर्दन के पसीने से वो 250 ग्राम पाउडर इस कदर चिपका दिखता मानो “मिथिलांचल चिकन पिज्जा” पर एक्सट्रा cheese topping की गई हो!

चौधरी जी कहते “अरे का मलेछ जैसन बारात जा रहे हैँ,तनी तेल कुड़ पाउडर लगा लिजिए,गर्मीया मेँ ठीक रहता है कि”। बारात वाले बस मेँ तो लड़का का मामा या फुफा बकायदा पाउडर का डिब्बा ले के चढ़ जाते थे और पूरे बस मेँ पाउडर छिड़कते थे।वो दुल्हे का रेँमड के रूमाल पर पाउडर छिड़क हमेशा मुँह और नाक ढके रखना। ये बारात की खुशबु अब कहाँ?

एक सेठ जी थे,पाउडर लगाने के बाद लगते थे जैसे पुरानी राजदूत मोटरसाईकिल को विश्वकर्मा पूजा के दिन धो पोँछ के चमकाया हो। जी साहब आज जब इंसान बिना पाउडर लगाये भी चेहरे को ढक के चलता है, कौन सियार है कौन भेड़िया पता ही नही चलता तब पाउडर का आवरण ही बढ़िया था जिससे आदमी बस चमड़ी का रंग छुपाता था, चरित्र नहीँ और गमगम भी करता था। वैसे पाउडर आज भी चलन मेँ है, गाँव के चौधरी जी से लेकर लोकप्रिय रविश कुमार तक को पाउडर आज भी चमकाता है।

मैँ मूलतः बिहारी हूँ और बिहारी चाहे बोलने समझने मेँ कितना भी स्मार्ट हो पर स्मार्ट दिखने का आत्मविश्वास उसे आज भी पाउडर से ही मिलता है। ये बात मैनेँ ndtv के रविश कुमार को देख जाना। बिना पाउडर प्राईम टाईम से अलग रविश जी को देखिये, वो चमक नही रहती। यहाँ दिल्ली मेँ सिविल की तैयारी वाले लड़के का पाउडर छिड़क निकलना खुब गुदगुदाता है। देखिये ना माँ ने मुझे गोरा दिखने और सुंदर दिखने के लिए रोज जबरन पाउडर लगाया। आज वक्त ने चेहरा रूखा कर दिया,संघर्ष और दुनियादारी के ताप ने चेहरा जला दिया। माँ का पाउडर धुल गया शायद।कुछ भी लगाता हुँ दाग छुपते नहीँ।आज भी जब अपनी कड़ी अँगुलियोँ को अपने रूखे गाल पर फेरता हुँ तो बरबस माँ याद आ जाती है” माँ देखो न,कितना जल गया हुँ,फिर से पाउडर लगा दो न,मुझे चमका दो न,अब नही भागुँगा माँ”।जय हो

नीलोत्पल मृणाल 

3 Comments on “बिना पाउडर प्राईम टाईम से अलग रविश जी को देखिये, वो चमक नही रहती

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