ग्लोबल गुमटी

मान

मान मत दो तुम मुझे अपमान दे दो, मैं बहुत आभार मानूँगा तुम्हारा

माने आदमी के घमंड का कोई पारावार नहीं है। वो किसी भी चीज़ के लिए हो सकता है। एक व्यक्ति इसीलिए सीना फुलाए बैठा था क्योंकि उसके चाचा के मामा के भतीजे के देवर के साढू पंचायत प्रधान के ड्राइवर हैं। या एक इसलिए चौड़ा हो रहा था क्योंकि बैंक की लाइन में सबसे आगे खड़ा था। 

इस मान का डंक लगने के लिए जीवन में अमीर होना, साड़ी-गाड़ी होना आवश्यक नहीं है। भिखारी भी बाक़ी भिखारियों से ज़्यादा कमाने से उनके सामने तीस मार खाँ बन सकता है। हाँ, इतना ज़रूर है कि हमारे मान का स्तर थोड़ा और ऊँचा हो गया है। दिखावा हमारी शान बन गया है। आदमी हवाईजहाज़ में बैठता बाद में है, पहले फ़ेसबुक पर status डालता है। 

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इस साल UPSC का रिज़ल्ट आया। देखते ही देखते चीज़ें बदल गयीं। अब मैं अखिल भारतीय सेवा का अधिकारी बन गया। हमारे देश के समाज में ऐसे लोगों के दाम बहुत बढ़ जाते हैं। लोग ‘क्यों बे’ की जगह ‘सर’ बोलने लगते है। मुँह फेरने वाले लोग कमरे में घुसने पर अब खड़े होकर अभिवादन करने लगे हैं। पहले ‘known’ calls भी कम आते थे अब ‘unknown’ calls भी भरपेट आने लगे हैं। ट्रेन में, गाँव में, मार्केट में – अपना परिचय देते ही लोग autographs और फ़ोन नम्बर माँग लेते हैं। इतना सब हो और मान का पारा चरम पर ना पहुँचे- कैसे सम्भव है? 

मेरे गुरूजी कहते थे-“लौकिक सफलता वास्तविक सफलता नहीं है, वास्तविक सफलता तो तब है जब चक्रवर्ती जैसा व्यक्तित्व भी आकर तुमको नमस्कार करे और तुमको मान की उत्पत्ति ना हो।”

कभी असहाय बूढ़े व्यक्ति को देखते हैं तो लगता है कि ये भी अपने ज़माने के “मैं चौड़ा, बाज़ार संकरा” रहे होंगे। इनके भी चरण वंदन होते होंगे। लेकिन अचानक ये बदलाव कैसे आ गया? समय, हितैषी, शरीर- सब दग़ा क्यों दे गए?

मध्यकालीन कवि, बनारसीदास जी (अकबर, शाहजहाँ के समकालीन) ने दुनियादारी और घमंड से दूर रहने को इन शब्दों में बयाँ किया-

“हम बैठे अपनी मौन सों।

दिन दस के मेहमान जगत में,

बोली बिगाड़ें कौन सों।।”

लेकिन ये मान की ग़ज़ब व्यवस्था है। ‘अप’मान किसी को नहीं चाहिए लेकिन ‘सम्मान’ सबको चाहिए। बाक़ी कुरीतियों (क्रोध, मायाचार, अभद्रता आदि) को तो परिवार वाले भी कोसते हैं, लेकिन मान का ऐसा मीठा ज़हर है जिसे अपने प्रियजन भी पिलाते जाते हैं। 

‘मेरे पास बंगला है, गाड़ी है, लुगाई है, पैसा है’ कहने वाले बहुत मिल जाएँगे लेकिन ‘पर दुक्खे उपकार करे तो ये, मन अभिमान ना आने रे’ पर अमल करने वाले ढूँढने से भी नहीं मिलेंगे।

ज्ञान का, शरीर का, बुद्धि का, कुल का, प्रभुता का, बल का- किसी का भी घमंड हो सकता है। 

क्यों ना एक काम करें। क्यों ना दुनियादारी के कुछ कामों में मूर्ख बन जाएँ। लोग कहेंगे कि ये मूर्ख है, लोग कहेंगे कि इसे कुछ नहीं आता- लेकिन हम अपना काम करते जाएँ।

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मुझे भी लोग कहते हैं कि पोलिस चोर है, भ्रष्ट है, तुम कुछ नहीं कर पाओगे। या तो मैं उनकी सुनता रहूँ या थोड़ी देर के लिए चुप होकर उनके लिए मूर्ख बन जाऊँ। बस, अब मुझे अपना ध्यान वहाँ लगाना है जहाँ से कुछ अच्छा हो सकता हो। हो सकता है मैं सफल ना हो पाऊँ, लेकिन लोगों के कहने के कारण हार मानने से अच्छा है कि कुछ करने का प्रयास तो करूँ।

मैं भी पूरी कोशिश करूँगा, आप भी करिए- इस ‘मान’ को अपने बीच से हटाते हैं। ज़रूरत हो तो आप आगे बढ़कर ‘सॉरी’ बोल दीजिए, ये मत देखिए कि सामने वाला नहीं आया तो हम कैसे बोल देंगे? प्राचीन उक्ति है-“क्षमा वीरस्य भूषणम” (क्षमा वीरों का आभूषण है)। ज़रूरत हो तो आप रूठे हुए परिवार वालों को मान लीजिए। ज़रूरत हो तो कुछ ‘arguements’ में आप हार मान लीजिए लेकिन relationship ख़राब ना कीजिए। समारोह में आपका नाम ना ले, एक माला काम पहना दे, birthday विश ना करे या गिफ़्ट ना दे- ज़रूरत हो तो इनको इग्नोर कर दीजिए। 

बस, इस ‘ego’ से थोड़ा बच लेते है। क्या कहते हो?

एक कवि तो इतना ख़फ़ा हो गया कि ये लिख दिया-

“मान मत दो तुम मुझे अपमान दे दो,

मैं बहुत आभार मानूँगा तुम्हारा।” 

अगम जैन 

[author] [author_image timthumb=’on’]http://globalgumti.com/wp-content/uploads/2016/11/14671155_10210323772108677_6952643097249474117_n.jpg[/author_image] [author_info]अगम जैन प्रशिक्षु आईपीएस हैं. लिखने पढ़ने का गहरा शौक रखते हैं, किताबों को भी और समाज को भी. प्रस्तुत है व्यक्ति और समाज के सन्दर्भ में उनकी गहरी दृष्टी का परिचय देता हुआ यह लेख.[/author_info] [/author]

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5 Comments on “मान मत दो तुम मुझे अपमान दे दो, मैं बहुत आभार मानूँगा तुम्हारा

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