ग्लोबल गुमटी

रेडियो

नमस्कार ये आकाशवाणी है

नमस्कार! ये आकाशवाणी है

“रेडियो” है आपके पास? जी ये मोबाईल वाला “फैन्सी क्रेजी ढीप ढाप टीप टाप चैँ पौँ  कि कुँ एफ एम रेडियो” की बात नहीं कह रहा हूँ । आज अचानक एक सब्जी वाले ठेले पर रेडियो बजता सुना तो खयाल आया कि हाय अब कहाँ रहा “रेडियो” वाला ज़माना। रेडियो यूँ तो एक ज़माने में देश दुनिया से जोड़ने का सबसे सहज और सस्ता साधन रहा जो शहर और गाँव दोनों में लोकप्रिय था। पर जो यश और इज्ज़त “रेडियो” ने हिन्दुस्तानी गाँवों में पायी वो जलवा शहर में कहाँ था रेडियो का।

असल में गाँव के शांत वातावरण में 5 बजे भोरे या 8 बजे राते जब रेडियो बजता था तो मानो साक्षात ब्रह्मा की आकाशवाणी हो रही। शहर की चिल्ला चिल्ली में भला रेडियो की आवाज़ खुद को तो बड़ी मुश्किल से सुनाई पड़ती, भला कोई और क्या सुने। गाँव में देखते, भोरे भोर 5 बजे कि झा जी झट पट उठे, रेडियो उठाया, टार्च से निप्पो बैटरी निकाली, रेडियो में डाला, मीडियम लगाया और लगा दिया “आकाशवाणी भागलपूर”! पास के कुँआ के पास बने तुलसी जी के चबुतरा पर रखा रेडियो, उसमें आ रहा है अनूप जलोटा का भजन” प्रभु जी तुम चंदन हम पानी”। इधर झा जी लोटा दतुवन ले के खेत निकले उधरे दूर तक चिड़िया की चह चह और भजन की आवाज मतलब माहौल ऐसा जैसे सूरज के उगने के पहले गाँव में स्वागत गान गाया जा रहा हो। तब तक चबुतरा पर जो आ रहा है ऐँठ के मेगा हट्रज बदल दे रहा है।

रेडियो का मतलब एक सामाजिक यंत्र से था तभी तो बेफिक्र हो के रेडियो को सवेँऐँठन हेतु चबुतरा पर छोड़ झा जी खेत निकल लेते थे। इतने में सात बजा कि भुनेशर चौधरी मास्टर साब के घर बलदेव रजक, लोकन महतो, हरिहर पांडे सारे मास्टर जमा हुए। छोटका खटिया पर खोंस के रेडियो रखल है। “बीबीसी लगाईए चौधरी जी, समचरवा आ रहा होगा”  मंडल जी बोले।

रेडियो पर बीबीसी का माहौल वैसे था जैसे रामायण में राम का। जैसे समाचार वाचक ने कहा “अब आप नीरज कुमार अकेला से समाचार सुनें”  कि सारे चेहरे सावधान और कान की दिशा रेडियो के स्पीकर की तरफ। क्या मजाल कि उस बीच में कोई टोक दे। गाँव में सबके उसमें भी मास्टर साब जैसों के लिए बीबीसी की खबर ही जीवन का ज्ञान था जिसे बाँच कर दिन भर चाय पीना और खैनी खाना होता था।अच्छा समाचार वाचक भी ऐसा, एकदम निष्काम निर्विकार भाव से दुःख और खुशी दोनों के न्यूज़ एक ही भाव में पढ़ने वाला। समाचार ख़त्म कि समीक्षा शुरू “देखिये पाकिस्तान का, कोय भरोसा नहीं, बीबीसी जैसा बोल रहा है भयंकर युद्ध ना हो जाय”। तब तक चौधरी जी ” ई रिटायरमेंट के एजवा फेर 62 कर दिये, सुने कि नही जो बोला अभी बीबीसी”! रजक बोले  “नही त”।  “का महराज बीबीसी सुनते हैं अउर धयानो नही देते हैं, अभिये त बोला”।

दोपहर हुआ कि काँख में रेडियो लिये बल्लु यादव पंचायत भवन के चबुतरा पहुँच गये जहाँ ताश चल रहा है। अचानक रामजीतन चिचियाया “अरे मैचवा लगाओ बे, भारत सिरलंका मैईच है, शुरूओ हो गया होगा”। जी यही वो अवसर होता था जब ताश खेलने सभी 5वीँ फेल अंग्रेजी मेँ कमेँट्री सुन भी समझ जाते थे कि कब चौका लगा और कब आउट हुआ। आहा ” बिनाका गीतमाला” पुछिये मत! अमीन सयानी के आवाज का जादू आज तक गाँव में कायम है। रात के 8-9 बजे के बाद खा पी के मुखिया जी के दलान के ठीक पीछे वाले बगीचा में मँगरू मंडल अपना खटिया बिछैले है, मार ऐँठ रहा है चाबी, कभी बंगला, कभी खेल, कभी समाचार तो कभी नेपाली चैनल की गीँ चाँ के बाद लगा एकबैगे हिंदी गाना। गर्मी की रात, पछिया हवा और खटिया तरे रखा रेडियो। बज रहा नशा  “दिल ढूँढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन”! ख़त्म होते बजा “एक अकेला इस शहर में,आबो दाना ढूँढता है जैसे गीत। मानो पूरा वातावरण खुद में एक आर्केस्ट्रा बजा रहा हो। सच सुबह से लेकर रात सोने तक रेडियो गाँव की दिनचर्या का यंत्र था। मुश्किल से महीने में एक सिनेमा देखने वाली पीढ़ी को रेडियो ही था जिसने लता, मुकेश और रफी के गीत से जवान और ज़िन्दा बनाये रखा। गाँव के न जाने कितने रसिये को ज़िन्दगी का रंगीन रस पिलाने वाला एकमात्र वो  “रेडियो” ही तो था। एक कायम जलवा था रेडियो का।

गाँव की शादी हो और तिलक में रेडियो ना मिला तो समझिये लड़की वापस। न जाने कितने रूठे दुल्हे को मनाया और घर बसाया इस रेडियो ने। फिलिप्स और संतोष कंपनी का रेडियो तो मानो हर दुल्हे का सैवाला था। अगर भूल चूक से शादी में छूट गया तो गवना में रेडियो संग ही बहुरिया ससुराल आती थी। आँगन भले दुल्हनिया के पाजेब से झनझन गूँजता रहे पर दुआर तो रेडियो के ही बोलने से गुलजार रहता था। हमारे एक मास्टर साब को रेडियो इतना प्रिय था कि उनके पड़ोस में डकैत घुसा तो वो शोरगुल सुन पीछे से दिवाल फांद भागे और 7 बरस के बेटे को अकेला छोड़ दिया पर रेडियो काँख में दबाये रहे और सीधे थाने दौड़ वहाँ रेडियो रखा फिर वापस आ बच्चे का हाल जाना।

सच आज भी जहाँ  रेडियो है वह गाँव जैसा भी हो, वहाँ कुछ भी हो ना हो पर वहाँ “सन्नाटा” नही है। जय हो

 

नीलोत्पल मृणाल 

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