ग्लोबल गुमटी

train accident

हर रेल दुर्घटना के बाद हमारी संवेदनाओं पर उठते कुछ शर्मनाक सवाल

पिछले हफ्ते कानपुर के पुखरायां में इंदौर-पटना एक्सप्रेस दुर्घटनाग्रस्त हो जाती है। दुर्घटना कितनी वीभत्स रह होगी, इसका अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि पिछ्ले 6 सालों में ये सबसे बड़ी रेल दुर्घटना है, आधिकारिक आंकड़े 130+ मौतें और लगभग 400+ लोगों के घायल होने के हैं, ये आंकड़े ज़्यादा के भी हो सकते हैं। हर दुर्घटना की तरह इस घटना की भी जाँच, मुआवज़ा जैसी खानापूर्ति हो चुकी है। जाँच रिपोर्ट आ जाएगी, मुआवज़ा भी बंट जाएगा, पर रेल यात्रा को लेकर मन में बैठना वाला भय कोई नहीं बाँट पाएगा। इन मौतों का ज़िम्मेदार कौन है? ये हम और आप अपनी बुद्धि के हिसाब से तय कर लेंगे, पर आपका ह्रदय ये कब तय करेगा कि हम में अभी संवेदनशीलता जिंदा भी है या नहीं? हाँ मैं प्रश्नचिन्ह लगा रहा हूँ खुद पर, आप पर और दुर्घटनास्थल पर उपस्थित हर एक इंसान पर, हर उस नागरिक पर जो परोक्ष, अपरोक्ष किसी भी रूप में हर एक भारतवासी से जुड़ा है, क्योंकि सिर्फ़ इसी दुर्घटना पर नहीं अमूमन हर दुर्घटना पर एक ख़बर, अख़बार के पेज पर किसी बॉक्स में किसी कोने में लिखी हुई होती है या कोई भुक्तभोगी बताता है।

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दुर्घटनास्थल के आस-पास ट्रेवल या खाने-पीने जैसी अन्य आवश्यक सेवाएं देने वाले लोकल लोगों की मनमानी, लूट खसोट। कानपुर के पास हुई रेल दुर्घटना के बाद ऐसे अमानवीय व्यवहार के बारे में फिर से सुनने को मिला, ख़बर निश्चित ही बताती है कि हममें संवेदनशीलता की कितनी कमी आ गयी है।

रेल दुर्घटना के बाद यात्रियों को घटनास्थल से कानपुर सेंट्रल स्टेशन तक लाने के लिए लगाई गयी सिटी बसों ने 75₹ प्रति यात्री किराया वसूला, जिनके पास पैसे नहीं थे, उन्हें बीच रास्ते ही उतार दिया गया। उफ्फ्फ, इतनी संवेदनशीलता? ऐसा तो कतई नहीं होता कि इतनी लम्बे सफ़र पर निकले इंसान के पास कुछ अतिरिक्त रूपए न हों, हादसे में सब कुछ खो देने वाले के पास पैसे न हो तो आप उसे बीच राह छोड़ देंगे? किस मिट्टी के बने हो भाई? जिस सेवा को मुफ़्त दिया जा रहा है, उसके बदले आप पीड़ितों से मनमाने पैसे वसूल रहे हैं। डग्गामार वाहन 40-45 किलोमीटर की दूरी के लिए 500₹ तक वसूल रहे, गज़ब..! एक दुर्घटना से आप कितना कमा लोगे और फ़िर उससे कब तक ख़र्च चला लोगे? ज़मीर नहीं कचोटता आपका कभी? शायद नही होता होगा तभी न ये सब आप आसानी से कर लेते हैं।

पीड़ितों का फ़ायदा उठाना, जो बहुत कुछ अपना खोकर आपके पास आए उम्मीद से आए हैं, उनकी सहायता करने की जगह आप उन्हें बीच राह छोड़ दे रहे हैं, ज़रूरत से ज़्यादा पैसे लूट रहे हैं। यह सब एक इंसान की सम्वेदनशीलता कैसे हो सकती है? एक जानवर भी इतना संवेदनशील होता है कि अपने कनुबे के सदस्य के साथ कुछ अनिष्ट होने पर उदास होकर जो उससे बन पड़ता है सब करता है, आप तो फिर भी सर्वश्रेष्ठ हो, इंसान हो। आप ये घृणित कार्य कैसे कर लेते हो? एक बार सोच कर देखिएगा यही सब आपके अपनों के साथ हो तो? आपकी रूह तक सिहर उठेगी, मानवता पर से विश्वास खोने में पल भर नहीं लगाएंगे।

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कुछ दिन पहले नोटबन्दी और राष्ट्र-निर्माण को लेकर इसी सोशल मीडिया पर उदाहरण देखे थे कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी ने ब्रिटेन का शक्कर भरा हुआ जहाज बमबारी करके डुबो दिया था तो आपूर्ति के संकट के बीच, साम्य रखने के लिए वहां के जिन देशवासियों ने पास शक्कर ज्यादा थी, वे कुछ सप्ताह का घर के लिए स्टॉक रखकर बाकी की शक्कर दुकानों को वापस कर आये ताकि किसी दूसरे जरूरतमंद देशवासी को समस्या न हो। दूकानदारों ने भी कोई कालाबाजारी न कर उसी रेट पर चीनी बेची। तो किसी दूसरे देश में युद्ध के समय अण्डों की कमी होने पर देशवासियों ने अंडे नहीं ख़रीदे ताकि वो अंडे सेना तक सप्लाई हो सके, उन्हें कम न पड़े, इसके पलट यहाँ भारत में नमक ख़त्म होने की अफ़वाह मात्र पर लोग कालाबाज़ारी करने तो कुछ लोग स्टॉक करने में लग जाते हैं, फिर भला आपसे क्या उम्मीद करें कि आप हादसे के वक़्त संवेदनशील होकर किसी जरुरतमंद की मदद करेंगे। आप तो लूट-खसोट में लग जाते हो, बिन सामने वाले के दर्द का एहसास किये बिन।

देश का निर्माण सिर्फ़ सरकारें नहीं करती, वहाँ की जनता का इसमें विशेष योगदान होता है, आपकी मानसिकता का विशेष योगदान होता है, आपके जन भागीदारी का विशेष योगदान होता है। सिर्फ़ सीमा पर जाकर गोली खाने से राष्ट्र-निर्माण नहीं होता, अपने देश के हर पीड़ित जरुरतमंद नागरिक का सहयोग करके भी राष्ट्र-निर्माण होता है। सिर्फ़ बैंक की लाइनों में खड़े होने से राष्ट्र-निर्माण नहीं हो जाएगा, किसी हादसे में सब कुछ गंवा चुके इंसान के लिए निःस्वार्थ खड़े होने से भी राष्ट्र-निर्माण होता है। सरकारों का विरोध करके ही राष्ट्र-निर्माण नहीं होता, हादसों से पीड़ित इंसान से लूट-खसोट न करने से भी राष्ट्र-निर्माण होता है। इंसान बनिए, मानवता बनाए रखिए, सुख का न सही दुःखों का तत्व-बोध रखिए, आपसी विश्वास ही वो कुंजी है, जो हर इंसान को दूसरे से जोड़ता है, उसको मत ख़त्म होने दीजिए, वरना 127 करोड़ की जनसंख्या में भी खुद को आप अकेला महसूस करेंगे, हम भारतीय है, संस्कारों के लिए जाने जाते हैं, एक-दूसरे के सुख-दुःख में भागीदार बनने के लिए जाने जाते हैं, हमें ही इसे सहेजना है। दूसरों के दुःख को अपने स्वार्थ/फ़ायदे का किरदार न बनायें, ऐसे हादसों में जिस दिन देश का एक नागरिक, दूसरे नागरिक के लिए खड़ा होना भूल जाएगा, देश खुद-बा-खुद भरभरा कर गिर जाएगा।

~सौरभ मिश्रा, लखनऊ

लेखक लखनऊ में रहते हैं और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं|

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