ग्लोबल गुमटी

इंदिरा गाँधी

रौनक़ें जितनी यहाँ हैं कुछ औरतों के दम से हैं – इंदिरा गाँधी

रौनक़ें जितनी यहाँ हैं कुछ औरतों के दम से हैं……

मुनीर नियाजी के इस शेर से एक इंदिरा गाँधी की याद ही आती है. ‘आयरन लेडी’ का नाम इंदिरा को कड़े फैसले लेने वाली प्रधानमंत्री के रूप में उनकी प्रसिद्धी के चलते ही मिली थी. 71 का भारत-पाक युद्ध हो, पोखरन परीक्षण हो, ऑपरेशन ब्लू स्टार हो या फिर बैंकों का राष्ट्रीयकरण, उनके हर फैसले दूरगामी प्रभाव वाले सिद्ध हुए। किसी समकालीन टिप्पणीकार ने तो यहाँ तक लिखा है कि उस समय भारतीय राजनीति में वो अकेली मर्द थीं.

इंदिरा और गांधी

महात्मा गांधी के साथ नन्ही इंदिरा

वैसे तो इंदिरा अपने शासनकाल में कई फैसलों के लिए चर्चित रहीं जैसे – बैंको का राष्ट्रीयकरण, राजे-रजवाड़ों के प्रिवी पर्स की समाप्ति आदि. पर फिर भी उनके समय के दो निर्णयों ने कई अर्थों में भारत के इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया –

  1. बांग्लादेश का जन्म – पाकिस्तान और बांग्लादेश के अनुभव ने इतिहास की एक गलतफहमी दूर कर दी कि धर्म किसी राष्ट्र की एकता की गारंटी हो सकता है. पंजाबी मुसलमान बहुत पश्चिमी पाकिस्तान के आधिपत्य वाले शासन में पूर्वी पाकिस्तान के बंगाली मुसलमान अपने सामान्य नागरिक अधिकार भी खोकर और लगातार यंत्रणा सहते हुए घुट रहे थे. इसके खिलाफ शेख मुजीबुर रहमान के नेतृत्व में मुक्ति वाहिनी ने सशस्त्र विद्रोह छेड़ा और जवाब में पाकिस्तानी सेना यंत्रणा का कहर और बढ़ा दिया. फलतः भारत, खासकर आसाम में करीब दस लाख बांग्ला शरणार्थियों की बाढ़ आ गयी, जिससे आंतरिक और आर्थिक संकट पैदा हो गया. स्वतंत्र बांग्लादेश और मुक्तिवाहिनी के लिए भारत में हमेशा से सहानुभूति थी पर अब मौका था इस सहानुभूति को सीधे समर्थन में बदलने या न बदलने का निर्णय लेने का. अमेरिका के नेतृत्व का विश्वजनमत भारत के विरूद्ध था पर रूस के समर्थन के साथ भारत ने पूर्वी पाकिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप किया और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद किसी भी देश द्वारा सबसे बड़े आत्मसमर्पण का उदाहरण पेश करते हुए पाकिस्तान के 90,000 सैनिकों ने हथियार डाल दिए. और इसी के साथ विश्व मानचित्र पर बांग्लादेश के रूप में एक नए देश का उदय हुआ. विश्व इतिहास में सीधे सैन्य हस्तक्षेप से एक देश को स्वतंत्र करा देने के दुर्लभ निर्णयों में से एक के पीछे इंदिरा गांधी और उनकी  दृढ़ इच्छाशक्ति थी जिसने आंतरिक और अंतर्राष्ट्रीय दबावों का मजबूती से सामना किया. [ggwebadd]
  2. आपातकाल –  1975 में आम चुनावों में गड़बड़ी के आरोप में जेपी के नेतृत्व में एकजुट हुए सम्पूर्ण विपक्ष द्वारा सत्ता को चुनौती मिलने के बाद इंदिरा ने नागरिक अधिकारों को रद्द करते हुए और प्रेस एवं मीडिया पर सेंसरशिप लगाते हुए आपातकाल की घोषणा कर दी. संजय गांधी द्वारा जबरन थोपे गए नसबंदी कार्यक्रम और सत्तापक्ष द्वारा अभूतपूर्व दमन के कारण आपातकाल को इंदिरा के राजनैतिक जीवन का निम्नतम बिंदु कहा गया. इस घटना के बाद एक संवैधानिक संकट की स्थिति पैदा हुई जो न्यायपालिका बनाम संसद और मूल अधिकार बनाम नीति निदेशक तत्व की सर्वोपरिता के झगड़े के रूप में लम्बे समय तक चली और जिसका पूर्ण समाधान संभवतः अब तक नहीं हो पाया है.

स्वर्ण मंदिर में छिपे खालसा आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले के खिलाफ सेना को ऑपरेशन ब्लूस्टार के लिए हरी झंडी देना भी उनका एक विवादास्पद निर्णय था जो अंततः उनकी ह्त्या का कारण बना. हालांकि उनके निजी सचिव रहे आर के धवन ने बाद में दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि इंदिरा व्यक्तिगत रूप से आपातकाल और ऑपरेशन ब्लूस्टार दोनों की विरोधी थीं पर अपने सलाहकारों विशेषकर आपातकाल के सन्दर्भ में बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे, तत्कालीन विधि मंत्री एच आर गोखले, कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरूआ और बॉम्बे कांग्रेस अध्यक्ष रजनी पटेल के दबाव में उन्होंने आपातकाल लगाने का निर्णय लिया था.

संजय गाँधी की असमय मौत के बाद कहते हैं इंदिरा गाँधी टूट सी गयी थी, जब देश की इंटेलिजेंस ने उन्हें ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद उनके अंगरक्षकों को बदलने की सलाह दी तब इंदिरा ने इस सुझाव को ये कहकर ख़ारिज कर दिया कि ऐसे कदम से एक समुदाय विशेष के प्रति अविश्वास फैलेगा और वह कतई इसके लिये तैयार नहीं थी . वो दिन था 31 अक्टूबर 1984 जब प्रातः 9 बजे के लगभग श्रीमती गाँधी अपने निवास स्थल से बाहर आयीं . निवास स्थान 1,सफदरजंग रोड से उन्हें एक सुपरिचित मार्ग से 1,अकबर रोड पर जाना था, जहाँ उनका कार्यालय था . उस दिन नौ बजे के करीब उन्हें प्रसिद्ध अभिनेता-लेखक पीटर उस्तिनोव को साक्षात्कार देना था. साक्षात्कार एक विदेशी टीवी स्टेशन के लिए था. चूँकि दोनों स्थानों के बीच ज्यादा फासला नही था और साक्षात्कार भी अनौपचारिक था इसलिए उन्होंने उन सुरक्षा साधनों का उपयोग नही किया .

जैसे ही वे दोनों स्थानों को जोड़ने वाले संकरे पक्के मार्ग पर, जिसके दोनों ओर झाड़ियाँ उगी थी, आयीं, दरवाजे पर खड़े सब-इंस्पेक्टर बेअंत सिंह ने उनका अभिवादन किया और दरवाजा खोला. जैसे ही श्रीमती गाँधी आगे बढीं, उसने अपनी पिस्टल निकाली और एक मीटर से भी कम फासले से उन पर दनादन गोलियां बरसाने लगा . श्रीमती गाँधी “अरे यह क्या…???” कहती हुई जमीन पर गिर पड़ी. तभी सुरक्षा गार्ड सतवंत सिंह ने भी फुर्ती से दूसरी ओर आकर अपनी थाम्पसन कार्बाइन से मृतप्रायः श्रीमती गाँधी पर दनादन गोलियां चलानी शुरू कर दी. उसने 20 राउंड गोलियां चलाकर जमीन पर पड़े शरीर को बींध डाला . इसके बाद बेअंत सिंह ने 3 राउंड गोलियां और चलाकर उनके शरीर को छलनी कर दिया . फिर दोनों ने अपने अपने हथियार फेंककर वहां मौजूद स्तब्ध लोगों से कहा, “हमें जो करना था,कर दिया, तुम्हे जो करना है, करो”

इंदिरा गाँधी जा चुकी थीं, उनकी हत्या उनके ही दो अंगरक्षकों ने कर दी थी, और इस आयरन लेडी ने अपनी मृत्यु से कुछ ही समय पहले कहा था:

“भारत की नागरिकता एक साझी नागरिकता है. अगर एक भी नागरिक के लिए कोई ख़तरा पैदा होता है, चाहे वह जिस समुदाय, जाति, धर्म या भाषा समूह का हो, तो वह ख़तरा हम सबके लिए है.और सबसे ख़राब बात यह है कि यह हमारी प्रतिष्ठा घटाती है.”

 

डॉ. पूजा त्रिपाठी 

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3 Comments on “रौनक़ें जितनी यहाँ हैं कुछ औरतों के दम से हैं – इंदिरा गाँधी

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