ग्लोबल गुमटी

रेशम का रुमाल

रेशम का रुमाल

आज चन्दर कुछ ज्यादा ही चहक रहा था, सबेरे से ही एकदम लटपटा गया था, बाल संवार तो रहा था पर न जाने आज क्या हो गया था कि उसे पसंद नहीं आ रहा था, खैर जल्दी जल्दी बेल्ट लपेटा, जूता चढ़ाया, मोजा चढ़ाया, और निकल गया स्प्लेंडर लेकर……

कटरा की भीड़ भरी मार्किट में लहरदार कट मारते हुए, पहुंचा नेतराम कचौड़ी वाले के यहाँ, स्टाइल में गाडी लगाई और लपक के बोला “अमे ऐ चाचा तनि चार ठो कचौड़ी तो बाँध दियो” चन्दर तब तक दूकान के काउंटर तक पहुँच गया था, और बगल में कचौड़ी पैक करते कल्लू से बोला

“का बे कल्लू, तुम्हार वाली तो कल गजबे लग रही थी, देखें थे हम हियाँ कटरा में ही, सहेली के साथ आय रही, अमे ओकर सहेलीया भी भयनके है बे, कुछ जुगाड़ होइ का” इतना कह के चन्दर ने हमेशा की तरह खीश निपोरते हुये एक जोर का धौल कल्लू के ऊपर जमाया और कल्लू ने भी उसे गुरु के आशीर्वाद की तरह मान सिर्फ इतना कहा “का भईया आपौ न”

चन्दर ने लाल रंग की पन्नी में लिपटी कचौड़ी को स्प्लेंडर के हैंडल में ही लटकाया, और स्टाइल में किक मार के स्टार्ट कर चल पड़ा….कंपनी बाग़ के सामने पहुँच उसने गाडी साइड में लगाई और इंतज़ार करने लगा, थोड़ी देर बाद एक रंगबिरंगे रिक्शे में दो लड़कियां आती दिखाई दीं, चन्दर ने जल्दी जल्दी जेब से लिप् बाम निकाला और चुपके से होंठो पे रगड़ लिया, तब तक रिक्शा करीब आ चुका था,

रिक्शे से उतर सुधा सीधे चंदर के पास आई, और लजाते हुए कुछ खीज कर कहा….”का जी, आपको कुछ समझ नहीं आता का, कल काहे आप चिठ्ठी का गोला बना के कोठा पर फेंके थे, वही पे बाबू जी खाना खा रहे थे, उ पा जाते तब” चंदर अपने दोनों हाथ सर के पीछे ले खड़ा था, मुह में कमला पसंद था ..बिना थूके ही बोला…अमे करेजा, सब छोडो इ बताओ, केतना जोरदार लिखे थे……सुधा ने मुह बिचकाते हुए कहा….पढ़े थे, सब पढ़े थे, उ का लिखे थे कि

तुम छत पे न आती तो दीवाना न होता
तुम अद्धा न मारती तो काना न होता

इसका क्या मतलब था जी, भला मैनें कब अद्धा मारा आपको…चन्दर ने कमला पसंद थूक कर कहा…”अमे बुलबुल तुम समझी नहीं, अद्धा का मतलब रहा प्यार का बाण….. का समझी…….सुधा मुस्कुरा उठी थी

तब तक चन्दर को याद आया कि वो कचौड़ी लाया है वो बाइक के पास गया और पन्नी निकाल के सुधा को देते हुए बोला…लो, खाओ, नेतराम की कचौड़ी लाये हैं तुम्हरे लिए, एकदम गरम, जैसे तुम्हार गाल…….सुधा ने कचौड़ी हाथ में लेते हुए कहा, “केतनी बार कहा है चार मत लाया करो, चार से चौपट हो जाता है न” सुधा का इतना बोलना था कि न जाने क्यों चंदर खिलखिला के हंस पड़ा, और हाथ पकड़ बोला….”नहीं चौपट होने देंगे रे सुधा, कसम है हमें”

कंपनी बाग़ इलाहाबाद का सबसे बड़ा और सबसे खूबसूरत पार्क है, न जाने कितनी मोहब्बत की कहानियां यहाँ बनी बिगड़ी, और इसी पार्क में आजादी के समय चंद्रशेखर आजाद अंग्रेजो से लड़ते शहीद हो गए थे, सुधा और चन्दर घुमते घुमते आजाद की मूर्ति के पास पहुंच गए, चन्दर ने कहा….ऐ सुधा, कहो तो परान दे दे, पर एतना जान लो, बिना तुम्हरे जी न पाएंगे हम”

सुधा ने पेड़ के नीचे रुकते हुए कहा….अच्छा आये बड़े जान देने वाले, बाबु जी से हाथ मांग नहीं सकते, जान देंगे…हुह…दोनों एक पेड़ के नीचे बैठ गए और सामने खिल आये गुलमोहर के फूलों को देखने लगे, कुछ फूल धरती पर गिर पड़े थे, और सूख रहे थे, और कुछ ताजे थे जो अभी अभी गिरे थे….

सुधा को न जाने क्या सुझा कि उसने सुख रहे फूलो को उठाया और चन्दर के हाथ में देते हुए बोली, “ई लो, इन्हें फिर से पहले जैसा बना सकते हो, जिसमें महक थी, खुसबू थी” चन्दर चौंक गया था…बोला ..”बकलोल समझती हो का बे, अबे ई डाली से अलग हो गए हैं, अब कैसे महकेंगे” सुधा ने उन फूलो को बड़े गौर से देखते हुये कहा….और जानते हो चन्दर हमारे प्यार की डाली कौन है, तुम हो, हम खिलना चाहते हैं, महकना चाहते हैं, पर कभी सूखना नहीं चाहते” चन्दर ने बड़े प्यार से सुधा के चहरे को हाथों में भर कहा “अमे बुलबुल काहे अईसा बात बोलती हो, हम है न तुम्हरे साथ, और हमेशा रहेंगे”

बातें करते करते शाम होने को आई तो सुधा का मन धड़क उठा, अब तक तो बाबु जी भी आ गए होंगे, क्या होगा अब..दोनों जल्दी जल्दी निकले. चन्दर ने आज अपनी स्प्लेंडर को धन्नो समझ के चलाया था, और दोनों जल्द ही अल्लापुर के पानी टंकी के पास पहुँच गए थे……

इधर दो तीन दिन से सुधा का कुछ पता न था, पाड़े जी की छत पर लटकना भी काम न आ रहा था, और न फेंकी जा रही चिठ्ठियों का जवाब आ पा रहा था, चन्दर थोड़ा परेशान हो उठा था…..भाग के मंटू के पास गया ..मंटू पान की गुमटी पर ही मिल गया…चन्दर बोला…अबे ऐ मंटू, भाई ई सुधा कहाँ चली गई बे, तीन दिन हो गया, दिखाई नै पड़ी, एकदम बेचैनी लेस दिया है अब” मंटू ने पान का बीड़ा मुह में डालते हुए कहा…”अमे सुना है कोई रिश्ता आवा है, लड़के वाले बाहर के हैं तो बुलाये होंगे, वहीँ गई होगी”

चन्दर सन्न हो गया था..बोला..”भोसड़ी के मंटू अगर बात सही न निकली न तो तुम्हरी कबर खोद देंगे हम बेटा.. साले डरवाते हो बे”मंटू ने मौके की नजाकत को देखते हुए कहा, अबे नहीं बे चन्दर, सरोजा से पूछे थे, वही बता रही थी….चन्दर भागा भागा सरोजा के पास गया और सरोजा ने बात की पुष्टि कर दी…चंदर अब सच में उदास हो चला था

करीब आठ दिन बीत गए थे और सुधा का कोई पता न था…आज दिन भर चन्दर सुधा के घर के सामने ही खड़ा रहा, पर कोई न आया…चन्दर की उदासी बढ़ती जा रही थी, रात में छत पर लेटा तो न आज उसे तारे अच्छे लग रहे थे, न रेडियो के गाने….सुबह जब चन्दर सो के उठा तो खाट के पास एक रेशम के रुमाल पड़ा था…चन्दर ने उसे उठाया और खोला ..उसमें लिखा था

“नहीं रे चन्दर हम नहीं जाएंगे कहीं, किसी से न करनी शादी हमको, अच्छा सुनो आज फिर से कचौड़ी लाओगे का, उ लाल धारी वाला शल्ट पहन के आना, एकदम राजा नीयन लगते हो..चिठ्ठी फेंक रहें हैं, पाते ही पड़वा की छत पर आ जाना, देखे बिना मर गए है रे”

वो रेशम का रुमाल चन्दर के लिए क्या मायने रखता था, ये तो चन्दर ही जाने, पर न जाने क्यों, आज चन्दर की आँखों में आंसू थे, रुमाल को सीने से लगा लिया….

 

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