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सफ़र का रैन बसेरा :कुछ खूबसूरत लोग (नेपाल डायरीज 2)

सफ़र का रैन बसेरा………………कुछ खूबसूरत लोग

 

आप कभी अपने किसी भी यात्रा को याद करिये, एक मस्त हॉलिडे को, किसी “अमेजिंग” रोड जर्नी को ………याद किया? तो क्या बनाता है किसी भी यात्रा को ख़ास ? बिलकुल सही, साथ के लोग. वो लोग जो साथ चलते नहीं, पर वो रह जाते हैं यादों में, तस्वीरों में, सेल्फी के बचकाने चेहरों में और ब्लॉग के पोस्ट्स में.

नेपाल डायरीज के दूसरे हिस्से में मैं मिलाती हूँ आपको कुछ ऐसे ही किरदारों से मिलाती हूँ जिन्होंने इस सफ़र को जिंदा बना दिया. रक्सौल से गाड़ी बदलते हैं हम तीन दोस्त और यहाँ से नेपाल के लिये एक गाड़ी लेते हैं.सुबह के 6 बज रहे हैं और एक दोस्त के घर जाते हैं बॉर्डर खुलने के इंतज़ार को ख़त्म करने.

वो क्या है जो अब सिर्फ छोटे शहरों और गाँव -देहात में बाकी रह गया है- अघा के आतिथ्य करना.दोस्त के माता पिता हैं जिनसे हम पहली बार मिल रहे हैं .नाश्ता भी कर लो, स्नान भी कर लो, खूब प्यार से मिलते हैं लोग यहाँ , खूब दिल खोल के बतियाते हैं ,जनरेशन गैप को कोसते हैं, पूरे हक़ से आपको ज़िन्दगी की अहम् एडवाइस देते हैं और सफ़र का पहला माइलस्टोन बन जाते हैं. अंकल को न जाने कितनी ही कवितायेँ मुंह जबानी याद हैं, जानकर कि मैं लिखती हूँ वो अपनी कविता भी पढ़ते हैं और जब वो ऐसा करते हैं तो आंटी जी उन्हें प्यार से, एडमायर वाली नज़रों से देखती हैं. ये है इंडिया का मिडिल क्लास, सरकारी नौकरी के मलबे में न जाने कितने लेखक, आर्टिस्ट, संगीतकार और क्रन्तिकारी दब जाते हैं और फिर किसी के सामने 40 साल बाद कहते हैं “ मैं लेखक बनना चाहता था, मैं बहुत अच्छा लिखता था”, एक डर दौड़ जाता है मुझमे, एक सिहरन इस काश से होती है मुझे. हम अब इस प्यारे से परिवार से विदा लेते हैं. सिर्फ एक घंटे पहले हुई मुलाकात में भी आंटी जी शमी का पत्ता बाँध देती हैं मेरे स्कार्फ में कह कर कि सफ़र शुभ होगा. मैंने कहा था न कि इस दुनिया में बहुत खूबसूरत लोग हैं.

दमन के रास्ते पर हैं, एक लॉज में रुकते हैं रात बिताने. इस लॉज को एक पहाड़ी परिवार चलाता है, पहाड़ों से मेरे इस नये इश्क का एक बड़ा कारण सीधे सादे पहाड़ी लोग हैं. ये हमे प्यार से खाना खिलाते हैं, हमारे साथ बॉनफायर में नाचते हैं, लोक गीत सुनाते हैं और खूब गर्मजोशी से गले लगते हैं. दमन में हमारी आखिरी रात है, बहुत देर हो गयी है लौटने में, ये लोग हमारा खाना खाने का इंतज़ार कर रहे हैं. सभी लोग बैठते हैं खाना खाने, मन कुछ ख़राब है मेरा. सोचती हूँ कि एक लम्बी वाक पर जाऊं, खाने का भी मन नहीं है. करीब एक घंटे कोहरे के बीच वाक करती हूँ, वापस आती हूँ तो मेरी थाली लगी हुई है, पीछे से आवाज़ आती है “पूजा , तुम खाना क्यूँ नहीं खाया ?”

मैं हंस देती हूँ,कहती हूँ कि मन नहीं है. वो नेपाली में कुछ कहती है , मैं समझती हूँ कि भूखे  पेट नहीं सोना चाहिये. मैं हिंदी में कहती हूँ कि भूख नहीं है, वह नेपाली में पूछती है कि कुछ और बना दूँ, नूडल्स खाओगी क्या. मुझे उसके इस लाड़ पर प्यार आती है, ऐसा प्यार जिसके लिये न नेपाली में शब्द हैं, न हिंदी में .मैं उसे गले लगाती हूँ, वो मुझे ………….बगल में नेपाली और हिंदी भाषा खड़ी है, उन्हें पता है कि अब हमको उनकी जरुरत नहीं है. ये पहाड़ी परिवार रहा मेरे सफ़र का दूसरा माइलस्टोन.

नेपाल डायरीज में मैं आपको अगली किश्त में मिल्वाउंगी एक ऐसे कपल से जिसमें एक आर्टिस्ट बीवी के साथ दुनिया घूमता हुआ एक शख्स ईगो और मेल प्राइड से बहुत ऊपर समुद्र से 5000 फीट की उचाई पर मुझे रिलेशनशिप गोल्स दे जाता है, मिलते हैं कल पीटर से, नेपाल डायरीज के आखिरी हिस्से में क्यूंकि पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त.

 

डॉ. पूजा त्रिपाठी 

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