ग्लोबल गुमटी

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एक वैज्ञानिक जिस पर टैगोर ने लिख डाली कविता….

एक वैज्ञानिक जिस पर टैगोर ने लिख डाली कविता….

 

अगर आप भी मेरी तरह पेड़-पौधों से प्यार करते हैं, फूल तोड़ने से घबराते हैं कि कहीं उन्हें दर्द होगा, जमीन पर बिखरी हुई पत्तियों की कहानी पढ़ते हो, रात में सोते हुए पौधों को जगाते नहीं कि उनकी नींद में खलल ना पड़ जाए तो आपको जगदीश चंद्र बसु के बारे  में जानना ही चाहिए,  बल्कि जानते ही होंगे, उस कहानी के जरिये जो चौथी कक्षा में पढ़ी थी जहाँ बचपन में जगदीश चंद्र बसु की माँ  रात के  समय पौधों के बीच से गेंद उठाकर लाने से रोकती हैं और जिज्ञासु बसु सवालों की दुनिया में विचरने लगते हैं. क्यों माँ रात को पौधों के पास जाने, उन्हें छेड़ने से रोकती हैं? क्यों पेड़ के पत्ते तोड़ने से रोकती है और क्या पेड़-पौधों में भी भावनाएं होती हैं? क्या उन्हें भी दर्द होता है? क्या वे भी भोजन करते हैं? उन्हें भी भूख-प्यास लगती है?  

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30 नवंबर, 1858 को ढाका में जन्मे बसु भारत का गौरव हैं, अपनी बाल जिज्ञासाओं को साथ लेकर पले-बढ़े जगदीश चंद्र बसु को आज दुनिया  क्रेस्कोग्राफ (Crescograph) के आविष्कारक के रूप में पहचानती है. क्रेस्कोग्राफ़ वह यंत्र है जो पौधों की गति दिखाता है. पेड़-पौधों संबंधी उनकी खोज से सब चमत्कृत हुए कि निर्जीव से दिखने वाले ये पेड़-पौधे वास्तव में सांस लेते हैं, भोजन करते हैं. 1772 में स्टीफन हेलेस की प्रकाश संश्लेषण सम्बन्धी खोज और परिणामों से यह साफ़ था कि पौधों की पत्तियाँ वायु से भोजन ग्रहण करती हैं तथा इस क्रिया में प्रकाश की कुछ महत्वपूर्ण भूमिका है। लेकिन उसे एहसास से जोड़कर देखने का श्रेय बसु दा को ही जाता है. पश्चिमी देशों जैसी सुविधायें नहीं होते हुए भी उनका कार्य सराहनीय है. जगदीश चन्द्र का बचपन जात-पात, छुआ-छूत के बीच गुज़रा लेकिन इसका लेशमात्र भी असर बसु पर नहीं पड़ा.

जगदीश के मन में कभी किसी मित्र के लिए अछूत का भाव पैदा नहीं हुआ. अपनी तीक्ष्ण बुद्धि के कारण इस वृक्ष-पुरुष के मन में अनेक बातों के प्रति कौतुहल जागृत रहता. वे बहुत कुछ देखते-सुनते और अपने मन में उभरी शंकाओं को पूछते – “पिताजी रात को आकाश में  दिखने वाली असंख्य  तारिकाएं दिन में कहाँ जाती हैं?” या “पेड़ों का रंग हरा क्यों होता है?” प्रतिउत्तर में पिता हमेशा कहते – “जब तुम बड़े हो जाओगे तब खुद ही इन प्रश्नों के उत्तर खोजना” जगदीश ने बताया- “पशु-पक्षियों की तथा जलचरों कि कथाएँ मैं बड़े आश्चर्य के साथ सुनता था. प्रकृति को जानने  की , उसके रहस्यों को खोजने की जिज्ञासा शायद इनमे से ही मुझमें जागी होगी.”  वे पौधे के बीज बोते और उनके उगने और वृद्धि का प्रतिदिन निरीक्षण करते. उन्हें सभी प्राणियों से प्यार था. उन्होंने अपने बागीचे में खरगोश और गिलहरी पाली तथा एक छोटे से तालाब में मछलियाँ और मेंढक पाले. इस तरह प्रकृति से उनका निरंतर संवाद चलता रहता.

गौरतलब है कि बेतार संदेशवाहक में जिस एंटिना का प्रयोग किया जाता है उसकी खोज के सूत्र भी जगदीश चन्द्र के एक प्रयोग में जन्में थे. वह इस प्रकार का दुनिया का पहला प्रयोग था जिससे प्रसन्न होकर सर मैकेंजी  ने जगदीश को 1000रु. का पारितोषिक भी दिया.

ब्रिटेन में एक व्याख्यान के दौरान बसु ने कहा कि

“मैं एक ऐसी भूमि से आया हूँ जिसने मानवीय ज्ञान की कक्षाएँ विस्तारित करने का कार्य जिस समय में किया वह समय अब बीत चुका है. उसके बाद वहाँ  तमोयुग छाया हुआ है. वह कार्य आज पश्चिम कर रहा है. लेकिन मेरे मन में एक ऐसी आशा जाग रही है- मेरा विश्वास है कि आपके मन में भी जाग रही होगी कि जल्द ही ऐसा समय आने वाला है जब इस कार्य में अपना दायित्व निभाने हेतु पूर्व एक बार फिर अपनी कमर कसने वाला है. जिसका लाभ सभी के लिए समुच्चय होगा.”

जगदीश चन्द्र का यह आशावाद भविष्यवाणी सिद्ध हुआ और 19वीं- 20वीं सदी को आकार  देने वाले अनेकानेक अनुसंधानवेत्ता भारत से हुए, जिनमें स्वयं बसु एक थे.

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साहित्य से बसु का रिश्ता भी अनोखा था. एक अनूठा वैज्ञानिक जिसे न केवल साहित्य में रूचि थी बल्कि उसका अच्छा ज्ञान भी रखता था. रविन्द्रनाथ टैगोर से उनकी दोस्ती भी उतनी ही दिलचस्प थी. रविन्द्र जब भी उन्हें अपनी कोई नई कथा सुनाते तो बसु उनसे जल्दी ही फिर से कोई नई  कहानी सुनाने का वादा लेकर ही वापस जाने देते. रवीन्द्र जैसे चिरबंधु बसु को मिले जिन्होंने उनके गौरव पर एक बांग्ला कविता भी लिखी –

विज्ञान लक्ष्मीर प्रिय पश्चिममंदीरे

दूर सिन्धु तीरे

हे बंधू गियेदमे तुमि जयमाल्या खानी

शेथा होते आनी

दीन हीना जननीर लज्जा नत शीरे

परवेद्गे धीरे

अदिति शर्मा 

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