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शनिदेव- तेल का खेल, वेद पुराण फेल

शनिदेव- तेल का खेल, वेद पुराण फेल

हड़प्पा काल मेँ सबसे परम पद शिव को प्राप्त हुआ, वैदिक काल मेँ इंद्र देव और प्रजापति देवता का जलवा कायम रहा और फिर गुप्त काल से शुरू हो सदियोँ तक देखिए तो सबसे अधिक महत्व विष्णु और उनके अवतारोँ का रहा। पर अब जब आप 21वीँ सदी के भारत को देखिए तो पाईएगा कि, अचानक सबको पछाड़ते हुए अगर धर्म के बाजार मेँ कोइ सबसे तेजी से उछाल पाने वाला देवता हैँ तो वो “शनि देव” उभर कर आये हैँ।

वैश्वीकरण और पूँजीवाद के दौर मेँ तैँतीस करोड़ देवताओँ मेँ यही एक देवता निकल के आये हैँ जिन्होँने वर्तमान काल और बाजार की नब्ज पकड़ी। जहाँ एक ओर गदा से लैस बलशाली बजरंग बली गाँव गली के चौराहे पर स्थापित एक बताशे और पुड़िया भर सिँदुर के लिए और महाकाल शिव एक बुँद गँगाजल के फेर मेँ लटपटाए रहे वहीँ शनि देव ने दुनिया के तेल और लोहा जैसे सबसे महत्वपूर्ण संसाधन को खुद से जोड़ बाजार का सबसे प्रभावशली देव होने का रूतबा पा लिया है।

शनि देव ग्रहोँ मेँ न्यायधीश माने गये हैँ और जब दुनिया मेँ राग, द्वेष अपराध बढ़े, बाजारू गलाघोँट प्रतियोगिता बढ़ी और लगातार पाप दूराचार के केस बढ़ने लगे ऐसे मेँ शनि देवता के न्याय का मंदिर चल निकला। अब लोगोँ मेँ वर्षोँ की त्याग तपस्या और सद्आचरण से देवता को खुश कर फिर कृपा पाने का समय ना रहा। उन्हेँ तुरंत रिजल्ट चाहिए था। इस फार्मेट को समझते हुए शनि देव ने इस भरोसे को स्थापित किया कि वो तुरंत परिणाम देने वाले देवता हैँ और जो भक्ती और अराधना को देखकर प्रसन्न होने की प्राचीन परंपरा मेँ नहीँ बल्कि तत्काल मैटर के अनुसार तुरंत फैसला देने वाले देवता हैँ।

अच्छा आज चुँकि संसार मेँ पाप बढ़ा सो लोग एक स्वभाविक नैतिक दवाब मेँ रहने लगे, जगत की इस कमजोरी को शनि देव ने पकड़ लिया। शनि समझ गये कि लोग को अब विष्णु कृष्ण टाईप सौम्य रूप से हड़काना मुश्किल होगा इसलिए उन्होँने अपनी एक आक्रामक छवि गढ़ी। वे समझ गये थे कि इस पापी और खुनी होती दुनिया को रामचरितमानस के चौपाई से नहीँ बल्कि भय से ही कंट्रोल किया जा सकता है।उन्होँने अपनी दो भोकाली कथाएँ भी बाजार मेँ चलवाईँ जिसमेँ उनका प्रचार हुआ कि शनि तो शंकर भगवान जैसे देव और रावण जैसे बलशाली को ना छोड़े थे, फिर तुच्छ मानव क्या चीज।

अपने माहौल के अनुरूप उन्होँने खुद का गेट-अप भी खतरनाक बनाया। काली काया एवं काली मुँछ रखी, काला कपड़ा पहना,काले कौऐ को वाहन बनाया।अपने मंदिर का रूप रंग बदला।आप शनि मंदिर जाईए तो लगेगा जैसे किसी सैन्य शत्ति का खुफिया कैँप है। चारोँ तरफ काला ग्रेनाईट,काले झंडे और काला कपड़ा पहने कमांडो जैसा एक पंडा जो खैरियत की राईफल नहीँ रखता है।पर मिजाज मेँ इनका पंडा अन्य सनातनी पंडो से इतर बड़ा तपाकी और अक्खड़ जैसा करेगा। कभी बिना माँगे आशीर्वाद दे देगा तो कभी माँगने पर भी गरिया देगा। कभी बेमतलब हँस के माथे पर काला तिल छिटक देगा, गाल पर तेल घस देगा तो कभी मनहुस की तरह आँख तरेर कर देखेगा। मतलब ये पंडा बिलकुल अलग ट्रेनिँग पाये हैँ जो शनि के अक्खड़ और आक्रामक छवि का प्रतिनिधित्व करते दिखाई देते हैँ।

अच्छा शनि देव ने अपनी पूजा मेँ पारंपरिक शैली को एकदम त्याग एक नया प्रारूप तैयार करवाया जो मध्य वर्ग के मिजाज को सूट करे।उन्होँने गणेश जी तरह मेवा और लड्डु जैसे घनघोर आउट डेटेट आईटम को हटा प्रसाद को नमकीन और तेलीय फ्लेवर दिया जो बाद मेँ उपयोग भी किया जा सके और उससे कुछ आर्थिक लाभ हो जिससे मंदिर की विधि व्यवस्था का खर्च चल सके।उनको सरसोँ का तेल चढ़ाया जाता है जो बाद मेँ हल्दीराम भुजिया वाले को बेचा जा सके। क्या पता कि कोई स्वदेशी कंपनी इनके तेल से तैयार”नवग्रह शांति भुजिया” बना बाजार मेँ उतार दे।आज शनि देव के पास तेल है, लोहा है, काला तिल का पहाड़ है, कपड़े का गोदाम है। मतलब केला और पेड़ा से अलग इनके पास वो टिकाऊ सामान है जिसे बाजार मेँ पुनः बेचा जा सके।

शनि देव ने प्रसार के लिहाज से भी बजरंग बली के औसत को पीछे छोड़ दिया है। जहाँ बजरंगबली जैसे देवता गाँव देहात मेँ ओझरा के रह गये, शनिदेव ने बाजार की ताकत समझते हुए शहरोँ को अपना ठिकाना बनाया। वो जान गये कि जहाँ स्वार्थ है, सब पाने की बेचैनी है वहीँ अपना सिक्का जमेगा। इनके शहर मेँ बड़े मंदिरोँ के अलावा मोबाईल मंदिर भी चलते हैँ जो शनिवार के दिन हर लाल बत्ती पर लगाये जाते हैँ। चुँकि ये नये देवता हैँ सो ये खुद आम जन तक पहुँच अभी अपनी जड़ जमा रहे हैँ। इन्होँने एक लोकतांत्रिक माहौल दिया है धर्म के बाजार को।ये एक भिखारी को भी अचानक करोड़पति होने का भरोसा देते हैँ। कुंडली बाजार मेँ भी केवल शनि का जलवा है।जिस पंडित को पूछिए शनि का उपाय बतायेगा।

अच्छा शनि देव ने भारतीय समाज के पुरातन मनोविज्ञान को समझते हुए तत्काल महिला द्वारा खुद को छुने पर पाबंदी रखी है। पर शनि का क्रेज देखिये कि धर्म और कर्मकांड मेँ विश्वास ना करने वाली प्रगतिशील पीढ़ी की एक युवती ने शिँगा मंदिर मेँ शनि देव पर तेल चढ़ा उनका श्रद्धा से मसाज करने का आंदोलन कर रखा है। ये दिवानगी तो सन्नी देओल और सलमान खान को भी कभी ना नसीब हुई। वैसे शनि देव आधुनिक समझदारी के देव हैँ। उम्मीद है बाजार मेँ महिला शक्ति के महत्व को देखते हुए वो जरूर नियम मेँ कुछ ढील देँगे और पुरूष संग महिलाएँ भी शनि देव के आँगन चिपचिपे श्रद्धा मेँ सने तेल तेल खेल पायेँगी।

कुछ भी हो, शनि देव ने स्वर्ग मेँ लेटे अप्सराओँ का नृत्य देखते देवता और उनके सामंती और राजसी ढाँचे को तोड़ इसे चौक चौराहे और अंतिम आदमी तक पहुँचा दिया है। एक तीन चक्के की रेड़ी पर लोहे का एक पत्तर ले उसमेँ कटोरी भर तेल डाल ये चलता फिरता मंदिर आपको किसी भी रास्ते दिख जायेगा।इनका पंडा कोई तिलकधारी या टिक्कीधारी नहीँ, बल्कि किसी भी जात का सड़क का कोई भी आम आदमी हो सकता है। एक ग्रह से खुद को आगे ला अपने बलबुते और बेजोड़ प्रबंधन से देव मेँ बदल लेने शनिदेव की जीवटता को मेरा प्रणाम। असली मनुवाद तो यहाँ टूटा है मर्दे।

जय शनिदेव। जय हो।

3 Comments on “शनिदेव- तेल का खेल, वेद पुराण फेल

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