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नयी पीढ़ी के लिए शारदा सिन्हा का छठ का उपहार

Image source - youtube
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छठ पूजा का नाम बिना शारदा सिन्हा के अधूरा है| ऐसा लगता है जैसे, सूर्य, सूप, नदी की तरह शारदा सिन्हा के गीत भी इस महापर्व का अभिन्न अंग है| पहले अर्ध्य की शाम में घाटों पर धीरे धीरे ढलते सूर्य और धीरे-धीरे बढ़ते अँधेरे में जगमगाते दीप के दृश्य में शारदा सिन्हा के छठ गीत अद्भुत जादुई बैकग्राउंड बनाते हैं| इसी तरह दुसरे अर्ध्य में सूर्य भी लगता है इन्ही गीतों की स्वरलहरियों पर थिरकते हुए उगता है| कभी कभी तो आश्चर्य होता है कि  1983 से पहले जब शारदा सिन्हा लोक संगीत के आकाश में धूमकेतु की तरह नहीं छायीं थीं तो लोगों के क़दमों को घाट की तरफ आस्था के अलावा कौन सी शक्ति खींच ले जाती होगी? इन गीतों को सुनते हुए व्रतियों और सूप-टोकरियों को घाट तक ढोने वाले कन्धों की पुरी पीढी बदल गयी पर हर साल ये गीत खरना की रात बने खीर की तरह ही ताजी सोंधी मिठास घोलते हैं पुरे माहौल में|

अब पद्मश्री शारदा सिन्हा जी ही नयी पीढी के लिए करीब तीन दशक बाद नए छठ गीत लेकर आयी हैं जो इन दिनों इंटरनेट पर खूब धूम मचा रहे हैं| मिजाज में ये गीत कहीं से भी उनके पुराने गीतों से अलग नहीं लगते| अलग है तो बस इनकी प्रस्तुति जो इसके वीडियो में ही झलक जाती है| वीडियो में एक बिहार से बाहर किसी महानगर में रह रहे एक नौकरीपेशा दंपत्ति को दिखाया गया है| इस जोड़ी में पति बिहार का है जबकि पत्नी शायद बिहार के बाहर की| लड़का नाश्ते की मेज पर बैठा फोन पर अपनी मां से तो खांटी भोजपुरी में बात करता है जबकि उसी मेज की दुसरी तरफ बैठी अपनी पत्नी से हिन्दी और अंगरेजी में|

यही वो पीढी है जिसके लिए नयी प्रस्तुति के साथ ये गीत और वीडियो बनाया गया है| बिहार से बाहर प्रवास करने वाली पहले की पीढियां अधिकांशतः श्रमजीवी बनकर बाहर निकली थीं| इन पीढ़ियों का छठ और छठ गीत से जुड़ाव जड़ और माटी वाला था पर इन पीढ़ियों से आगे बढ़कर बंगलौर, पुणे, हैदरबाद, गुडगाँव-नोयडा और चंडीगढ़ में बिहारियों की नयी पौध पनपी है जो बिना आं-ऊं किये अंगरेजी बोलती है, कॉर्पोरेट ढंग के कपड़े पहनती है, डायनिंग टेबल पे बैठकर बटर टोस्ट खाती है और आईटी कंपनियों के बोर्डरूम मीटिंग्स में आत्मविश्वास के साथ बैठती है|

इस पौध के मूल्य भी बदले हैं| इसलिए जब लड़के की मां बताती है कि घुटनों की बीमारी बढ़ जाने की वजह से इस साल वो छठ नहीं कर पायेगी और आगे आवाज में कसक लिए बोलती है कि इस बार घर पे कोई छठ नहीं कर रहा तब भी वह अपनी अलग संस्कृति वाली और इंग्लिश मीडियम से पढ़ी हुई बहु पर अपने संस्कार जबरन थोपना नहीं चाहती तो परंपरा के मरने की वही कसक बेटे के चेहरे पर छाया बनकर उतर आती है आर उसे वो बचपन की गुनगुनी यादों के सहारे अपनी पत्नी के सामने अभिव्यक्त भी करता है पर इस अभिव्यक्ति में इसे जिम्मेवारी या कर्तव्य के रूप में पत्नी पर थोपने की हल्की सी भी छुपी हुई गुजारिश नहीं दिखती| पर पत्नी स्वयं आगे बढ़कर परंपरा की डोर थाम लेती है|ये मूल्य इस नयी पौध के अपने हैं| जब शारदा सिन्हा जी के छठ गीतों का पहला संस्करण आया होगा तब ऐसा करना एक बहु के लिए परम कर्तव्य रहा होगा|अब कोई फर्स्ट ईयर की बीगिनर लेवल फेमेनिस्ट इसपर नयी बहस शुरू कर दे या कोई इसे नयी पीढ़ी में जड़ों की और लौटने की ललक और लोक परम्पराओं की स्वीकार्यता ठहराए, हम तो यही कहेंगे कि भोजपुरी लोकगीत में इतना सुन्दर वीडियो एक ताजे सुखद बयार की तरह है, बिलकुल अंतिम अर्ध्य के समय नदी से उठकर घाट तक आती हवाओं की तरह| आगे आप खुद वीडियो देखकर फैसला कीजिये…

इस गाने की धुन स्वयं शारदा सिन्हा ने तैयार की है और बाकी संगीत निर्देशन आदित्य देव का है| बोल लिखे हैं ह्रदय नारायण झा ने, गीत के प्रोड्यूसर हैं शारदा सिन्हा जी के बेटे अंशुमन सिन्हा जबकि वीडियो के निर्माता अंशुमन सिन्हा, अभिनेत्री नीतू चंद्रा और उनके भाई नितिन चंद्रा हैं| नितिन चंद्रा ही इसके वीडियो निर्देशक हैंजो इससे पहले ‘देसवा’ नाम की देश विदेश में पुरस्कृत फिल्म बना चुके हैं| इस वीडियो में अभिनय किया है पटना के रहने वाले और और अभी अपेक्षाकृत नए पर एम् एस धोनी और देसवा जैसीं फिल्मों में अपनी प्रतिभा दिखा चुके क्रान्ति प्रकाश झा ने और उनकी पत्नी का किरदार निभाया है चेन्नई की रहने वाली खूबसूरत क्रिस्टीन जेडेक ने और इन दोनों ने अपनी भूमिका के साथ पूरा न्याय किया है|

छठ की हार्दिक शुभकामनाएं…

 निशीथ सिंह 

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