ग्लोबल गुमटी

ravan-sita

सीता-रावण :एक प्रेमगाथा

सीता-रावण :एक प्रेमगाथा

 

त्रेता युग की बात है , दशरथ द्वारा राम के वनवास का आदेश निकाला जा चुका था, इस बात से सीता काफी रोमांचित थी। जबसे सीता मिथिला से आयी थी कही घूमने नहीं जा पायी थी बेचारी। सीता को लगता था राम कोई पागल थोड़े न हैं जो सठियाये बाप के आदेश के लिए 14 साल वन में रहेंगे, अरे बाप का मन रखने के लिये जायेंगे और दो चार दिन में फिर वापस आ जायेंगे, वैसे भी जंगल में अयोध्या राज्य का कोई रिजॉर्ट या pwd का डाक बंगला तो होगा ही।

 

इसी उत्साह में सीता राम के साथ ख़ुशी -ख़ुशी वन को निकल लेती है। लेकिन जंगल में पहुँचने के साथ सीता का भ्रम टूटने लगता है। सीता को वहाँ पता चलता है कि उसका पति दुनिया का सबसे खूसट पति है । सीता समझ लेती है कि यह राम अपने बाप से भी बड़ा मूडी है , ’14 साल का मतलब 14 साल ‘ और बीच में कोई पैरोल भी नहीं। जंगल में एक -एक पल बिताना सीता के लिये कठिन हो रहा था। फूस की झोपड़ी और कुश के बिछौने पर सीता को रात भर नींद नहीं आती उस पर भी निर्दयी राम सीता को 4 बजे ही उठा देता। 24 घंटे में खाना भी मिलता तो एक बार, वह भी घास-पात। ब्रेकफास्ट और डिनर तो सीता के लिये सपना हो गए थे । गजब का शोषण हो रहा था उस अबला का।
सीता दिन रात महिला अधिकार मंच वाली बड़ी बिंदी गिरोह को याद करती, लेकिन याद करके क्या करती वह चित्रकूट के जंगलों में थी कोई दिल्ली में थोड़े ही जो उसे फ़ास्ट रिलीफ मिलती। राम और लक्ष्मण तो रोज धनुष-बाण ले निकल जाते जंगल में मंगल करने और सीता बेचारी पड़ी रहती कुटिया में अकेले। ऐसे में एक दिन सीता की भेंट मर्यादा पुरुषोत्तम रावण की बहन उदारमना सूर्पनखा से हो गयी। धीरे धीरे दोनों में प्रगाढ़ दोस्ती हो गयी। सूर्पनखा से बेचारी सीता का हाल देखा नहीं जाता, वो सखी सीता को समझाती कि इस अधम आदमी को छोड़ क्यों नहीं देती, जिसको तुम्हारा खयाल नहीं उसके चक्कर में क्यों पड़ी हो। अगर तुम कहो तो मै भइया रावण से बात करूँ ओ तुम्हारी जरूर सहायता करेंगे। तुम लंका में बहुत सुख से रहोगी वहाँ सोने का महल है वो भी सेंट्रली एयरकूल्ड। सूर्पनखा के मुँह से रावण की सज्जनता के किस्से सुनकर सीता भी रावण की तरफ धीरे धीरे आसक्त होने लगी। इसी बीच एक दिन लक्ष्मण ने सीता और सूर्पनखा की बात सुन ली और गुस्से में आकर लक्षमण ने सूर्पनखा की नाक काटकर कुटिया से भगा दिया।
उधर सूर्पनखा लंका पहुंचकर भाई रावण से सीता की विवशता बताई। सीता की दारुण दशा के बारे में सुनकर कोमल ह्रदय वाला रावण विह्वल हो गया , उसने तुरंत प्रतिज्ञा ली की वह सीता का उद्धार करके रहेगा। रावण तुरंत अपने चॉपर से मारीच को लेकर वन की और प्रस्थान कर गया । कॉप्टर के लैंड करते ही सबसे पहले उसने रेकी करने के लिये मारीच को भेजा। चूँकि रावण शांति प्रिय इंसान था वह कोई हिंसा नहीं चाहता था इसलिए उसने मारीच का प्रयोग किया। सब कुछ क्लियर होते ही रावण नीचे उतरा ,उधर सीता पहले से ही इंतज़ार में व्यग्र थी , रावण को देखते ही वह लक्ष्मण रेखा को लांघते हुए जाकर चॉपर में बैठ गयी।
सीता को आसमान से ही लंका बड़ी मनोहारी लग रही थी, सीता के मन में लड्डू फूट रहे थे। लेकिन नीचे उतरते ही एक अनापेक्षिक घटना हो गयी। मंदोदरी महल के द्वार पर दुनाली लिये खड़ी थी, कहने लगी कि मेरे जीते जी कोई परायी स्त्री महल में प्रवेश नहीं कर सकती। पत्नीव्रता रावण चाहकर भी मंदोदरी को मना नहीं सका। अंत में सीता को एक वाटिका में जगह लेनी पड़ी। सीता अपनी किस्मत पर दहाड़े मार रो रही थी ,”क्या मेरी किस्मत में सिर्फ जंगल और वाटिका ही लिखी है?”
उधर जंगल में कोहराम मचा था।लक्ष्मण चाहता था कि राम से बता दे कि इस अपहरण कांड में खुद भाभी की भी संलिप्तता हो सकती है और इस पहलू की भी जाँच होनी चाहिये लेकिन डरता था कि मूडी राम कही उसे लतिया न दे।
खैर पता चल जाता है कि बहला फुसला कर सीता को लंका का राजा रावण पंडित अपने साथ ले गया है। चढ़ाई की रणनीति बनने लगती है।राम अपने छलिया स्वभाव से जंगल के समस्त आनर-बानर, भालू रीक्ष को पेटा के लाख विरोध के बावजूद अपनी सेना में भर्ती कर लेता है। राम को विभीषण का भी साथ मिल जाता है, एक रात विभीषण गलत नियत से सीता की वाटिका की बाउंड्री लांघते वक्त पकड़ लिया गया था। स्त्री पर बुरी नजर डालने के अपराध में रावण ने विभीषण के पिछवाड़े पर दो लात लगा के राज्य की सीमा से निष्कासित कर दिया था, तबसे वह ढोंगी राम का विश्वासपात्र हो गया था।
चढ़ाई हुई युद्ध हुआ , भयंकर युद्ध हुआ। धर्मराज रावण ने सीता को अधमी राम के हाथों न लगने देने के लिये पराक्रम से लड़ते हुवे अपने समस्त खानदान को न्योछावर कर दिया, फिर भी सीता की रक्षा न कर सका। उधर लक्षमण धीरे धीरे राम को कन्विंस कर लिया था कि  ‘भौजी अपने से भागी थीं’। अब राम सीता को देखना नहीं चाहता था , सीता जैसी भोली स्त्री को दुष्ट राम कभी जंगल भेजता तो कभी आग में। जबतक सीता जिन्दा रही तबतक खलु प्रकृति का राम तरह तरह से सीता की परीक्षा लेता रहा और अपने खुद दरबार में चाटुकार भाइयों के साथ ऐय्याशी में आकंठ डूबा रहता। अंत में धरती माता भी सीता पर राम के अत्याचार को बर्दाश्त नहीं कर सकी और अपना सीना फाड़कर सीता को अपने आगोश में ले लिया।

 

*यह कहानी संजय लीला भंसाली की अपकमिंग फिल्म “सीता-रावण :एक प्रेमगाथा” से ली गयी है।

Leave a reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

आपकी भागीदारी