ग्लोबल गुमटी

कब तक सबको राष्ट्रद्रोही और गद्दार का सर्टिफिकेट देते रहेंगे?

लोकतंत्र को मजबूत करता सोशल मीडिया

बीएसएफ जवान तेज़ बहादुर यादव का एक वीडियो सोशल मीडिया पर इस कदर वायरल हुआ कि गृह मन्त्रालय को 24 घण्टे के अंदर इस विषय का संज्ञान लेना पड़ा। वायरल वीडियो, बीएसएफ जवान द्वारा खाने की गुणवत्ता पर था साथ ही अपने उच्च अधिकारियों पर भ्रष्टाचार का आरोप था कि, सरकार द्वारा मिलने वाले पैसे/रसद को वो बेच लेते हैं।
विषय की गम्भीरता इसी बात से लगा सकते हैं कि ये वीडियो 80 लाख से ज्यादा लोगों ने देखा हुआ है, ख़ैर ये सोशल मीडिया है, इसकी ताक़त एक राजनेता को प्रधानमंत्री तक बना सकती है।

वीडियो वायरल होने के बाद उठ रहे प्रश्नों से एक बात तो समझ आई कि रिटायर्ड CJI ठाकुर भले कह रहे हो कि कोर्टों में जजों की कमी है पर यहाँ सोशल मीडिया पर कतई नहीं हैं, हर एक इंसान खुद में जज है, वहीँ सुबूत इकठ्ठा करता है और निर्दोष और दोषी बताकर सज़ा भी मुकर्रर करता है। वीडियो के वायरल होने के बाद जहाँ पर प्राथमिकता यह बनती थी कि वीडियो की प्रमाणिकता क्या है, लगाए गए आरोप सही हैं या नहीं? भ्रष्टाचार या कालाबाज़री हो रही तो कौन अधिकारी इसमें शामिल हैं? तो कुछ लोगों द्वारा सवालों का रुख, 5 राज्यों के चुनावों, सैनिक की जाति और राष्ट्रद्रोह जैसे सतही प्रश्नों की तरफ मोड़ दिए गए।

ऐसे लोग खुद समझें, कि बिन जाँच वो कैसे किसी निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं? हो सकता है सैनिक सच कह रहा हो और सम्भावना ये भी हो सकती है कि किसी प्लान के तहत उसने किया हो? पर जाँच की फाइनल रिपोर्ट तक इंतज़ार कर लीजिए, कब तक सबको राष्ट्रद्रोही और गद्दार का सर्टिफिकेट देते रहेंगे?

अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाना अच्छी बात है, उस वीडियो में उस सैनिक ने यही आवाज़ उठाई है, अपने शरीर के लिए मिलने वाले पोषक भोजन पर, जोकि प्रथमदृष्टया काबिल-ए-तारीफ़ है। रोटी का अधिकार हर व्यक्ति को है, फिर तो उस रोटी का पूर्ण भुगतान उसकी सर्विस के बदले सरकार दे रही है तो फिर किसी को क्यों समझौता करना चाहिए। उस वीडियो में उसने कहीं भी न तो सरकार पर न तो सम्पूर्ण सेना पर भ्रष्टाचार, बदनीयत का आरोप लगाया है। उसने सिर्फ़ उन अधिकारियों पर सवाल उठाए हैं, जिसके लिए वह उन्हें जिम्मेदार मानता है।

आप अपने जजमेंट से वीडियो की प्रासंगिकता मत ख़त्म कीजिए, आपके पास बहुत सारे तर्क होंगे कि वो VRS ले रहा था, इसलिए ऐसा किया। जाति तुष्टिकरण से सरकार के ख़िलाफ़ चुनावों को प्रभावित करने की योजना का एक हिस्सा है, हर वक़्त 56 भोग नहीं मिल सकते, नौकरी के बाद राजनीति में आना चाहता होगा ब्ला ब्ला ब्ला पर अभी ये सब आपके व्यक्तिगत अंदेशा ही है। पर इन सब के इतर अग़र किसी ने आवाज़ उठाई है तो उसे समर्थन नहीं दे सकते तो उसे वापस भी मत खींचिए, फाइनल रिपोर्ट के बाद अग़र आपको लगता है कि उसकी नीयत ठीक नहीं थी, तो सब कुछ कहने के लिए आप स्वंत्रत है पर बिन फाइनल रिपोर्ट आप उसकी जाति को टारगेट न कीजिए, आप उसकी देशभक्ति पर प्रश्नचिन्ह न लगाइये, उसके साहस को मत मारिए।

रामराज्य जैसी व्यवस्थाएं तभी मिलती हैं, जब हर नागरिक उसके अनुसार आचरण करें। गलत को गलत कहने का साहस जुटा पाए और सही की प्रसंशा किए बिन न रह पाए। उस सैनिक ने अग़र अपने अनुसार ऐसी भ्रष्ट गतिविधियों के लिए आवाज़ उठाई है, तो प्रासंगिक उद्देश्य पर टिके रहते हुए उसका समर्थन कीजिए। उद्देश्य का फ़िलहाल राजनीति, सरकार, धर्म, जाति के बीच अन्तर्सम्बन्ध न बनाएं। अग़र हर सामान्य बातों को इन्हीं संदर्भों से जोड़ते रहेंगे तो कभी कोई आवाज़ आपको निष्पक्ष और ईमानदार लगेगी ही न।

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का जिस गर्व से सीना फुलाते हुए आप इसका बखान करते हैं, उसका सम्मान भी आपके हाथ है, जहाँ स्वंत्रता की अभिव्यक्ति हर इंसान का अधिकार है और शोषण और भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ उठाना भी किसी राष्ट्रवाद और देशप्रेम से कम नहीं हैं। नहीं कुछ तो न्यायपालिका पर आपका विश्वास होगा ही, नहीं तो आख़िर में इस सोशल मीडिया पर सुप्रीमेस्ट कोर्ट ऑफ़ जस्टिस का विकल्प तो आप सबने बना ही रखा है।

(विशेष- सैनिक ने अपने वीडियो में कहीं भी इस भ्रष्टाचार के लिए सरकार पर आरोप नहीं लगाए हैं, उल्टा सरकार पर विश्वास दिखाते हुए जाँच और मदद की मांग की है, इसलिए हे अंधभक्तों, विनम्र अनुरोध और सादर अनुनय है, प्लीज़ सर्टिफिकेट मत देने लगियेगा)

नोट बैन

सौरभ मिश्र

लेखक लखनऊ में रहते हैं और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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