ग्लोबल गुमटी

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मैं उठना चाहता हूँ, दौड़ना चाहता हूँ, गिरना भी चाहता हूँ बस रुकना नहीं चाहता

फिल्म 3 इडियट के रैंचो का वो स्कूल याद है आपको. एक ऐसा स्कूल जहां अनोखे प्रयोग किए जाते थे. जहां बच्चों को ऐसी तकनीक सिखाई जाती थी जो किसी अजूबे से कम नहीं थी. न तो आप स्कूल को भूले होंगे और ना ही स्कूल चलाने वाले फुंसुख वांगड़ू को

फिल्म 3 इडियट में आमिर खान के किरदार का असली नाम फुंसुख वांगड़ू था और आप यह जानकर हैरान रह जाएंगे कि फुंसुख वांगड़ू का यह किरदार असल जिंदगी के एक टीचर से प्रभावित था. जिनका नाम है सोनम वांगचुक.

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फिल्म में आमिर ने एक ऐसे किरदार की भूमिका निभाई थी जो शहर की भीड़ भाड़ से दूर किसी शोहरत की चाहत के बगैर लद्दाख में हालात को बदलने में जुटा है. वहां के बच्चों के भविष्य को संवारने में जुटा है, और हकीकत में यह काम करते हैं सोनम वांगचुक. लेकिन आज हम सोनम के बारे में इसलिए बात नहीं कर रहे हैं कि सालों पहले आमिर खान ने पर्दे पर उनका किरदार अदा किया था. आज इंजीनियर सोनम वांगचुक इसलिए चर्चा में हैं क्योंकि इनके हुनर को दुनिया ने सलाम किया है.

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सोनम के सबसे अनोखे आइस स्तूप को rolex अवार्ड से सम्मानित किया गया है. उन्हें लॉस एंजिल्स में 40 वें rolex अवॉर्ड के दौरान सम्मानित किया गया.

यह है सोनम वांगचुक द्वारा ईजाद की गई नई तकनीक का नतीजा जिसे उन्होंने आईस स्तूप का नाम दिया है.

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दुनिया आज वांगचुक के इस अनोखे प्रयोग को देखकर हैरान है क्योंकि उन्होंने लद्दाख जैसे सूखे इलाके में कृत्रिम ग्लेशियर बनाकर यहां रहने वालों की जिंदगी बदल दी. लद्दाख जैसे सूखे और शुष्क रेगिस्तान में पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है लेकिन पर्यावरण में आ रहे बदलावों ने यहां पानी की गंभीर समस्या खड़ी कर दी है. इससे निपटने के लिए सोनम ने बर्फ का स्तूप खड़ा कर दिया है और इसी वजह से उन्हें पर्यावरण और पानी बचाने के लिए rolex अवार्ड से सम्मानित किया गया

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इस अवार्ड की अहमियत आप इसी से समझ सकते हैं कि इस साल पूरी दुनिया से सिर्फ 10 लोगों को ही rolex अवार्ड दिया गया और इनमे से एक अवार्ड हासिल कर इस इंजीनियर ने हमारे देश का नाम बुलंदियों पर पहुंचाया है. यह अवार्ड उसी rolex कंपनी की तरफ से दिया जाता है जो दुनिया भर में घड़ियों का सबसे बड़ा ब्रांड है. यह उन लोगों को दिया जाता है जिन्होंने अपनी सोच और करिश्मे से दुनिया को बदला है.

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1976 से हर साल दिए जा रहे इस अवार्ड को पाने वाले सोनम वांगचुक दूसरे भारतीय हैं. इससे पहले झीलों को बचाने के लिए 2012 में अरुण कृष्णमूर्ति को यह सम्मान दिया गया था.

इस सम्मान के तहत सोनम वांगचुक को करीब 67 लाख रुपए मिले हैं. इन पैसों को सोनम ने लद्दाख में शिक्षा व्यवस्था को बेहतर करने के लिए दान करने का फैसला किया है. यही सादगी यही जज्बा सोनम को सबसे अलग करता है.

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दरअसल सोनम लद्दाख की जमीन पर किसी बौद्ध भिक्षु की तरह रहते हैं जो उनकी तरह कपड़े तो नहीं पहनते लेकिन जीवन उनके जैसा सादा ही जीते हैं. वह एक ऐसे वैज्ञानिक हैं जिन्होंने अपना सारा ज्ञान लद्दाख की सूखी जमीन के भविष्य को सींचने में लगा दिया. वो एक ऐसे  इंजीनियर हैं जिन्होंने अपनी नई तकनीक से दुनिया को एक नया रास्ता दिखाया हैं.

आइस स्तूप है क्या और कैसे काम करता है

बर्फीला रेगिस्तान, बंजर जमीन और हांड कपा देने वाली ठंड. भारत के सुदूर उत्तर में हिमालय की गोद में मौजूद लद्दाख, भारत का सबसे ठंडा इलाका है. सैलानी यहां की खूबसूरती का नजारा लेने आते हैं लेकिन यहां हर साल पडने वाली मौसम की मार का अंदाजा उन्हें बिल्कुल नहीं होता. उसे झेलते हैं यहां रहने वाले लोग.

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लद्दाख में सालाना 100 से 50 मिलीलीटर ही बारिश होती है यानी पानी की जबरदस्त किल्लत. ग्लोबल वार्मिंग का असर भी इस इलाके में दिखने लगा है. लद्दाख जैसे बर्फीले रेगिस्तान में ग्लेशियर पर ही ज़िन्दगियाँ टिकी हुई हैं. खेती के लिए किसान सिर्फ ग्लेशियर से निकलने वाले पानी पर ही निर्भर हैं लेकिन तेजी से पिघलते ग्लेशियर की वजह से यहां कभी सूखा पड़ता है तो कभी भयंकर बाढ़ आ जाती है फिर भी यहां के लोगों ने मुश्किल हालात से गजब का तालमेल बैठाया है. वह बेबस नहीं है, लोगों की तरस के मोहताज नहीं है. बंजर रेगिस्तान के बीच उन्होंने हरे-भरे गांव बसायें हैं और यह सब मुमकिन हुआ है कृत्रिम ग्लेशियर की वजह से और इसे तैयार किया है सोनम वांगचुक ने. उन्होंने इसे आइस स्तूप का नाम दिया है. स्तूप इसलिए क्योंकि यह लद्दाख के बौद्ध लोगों के पवित्र प्रतीक स्तूप के आकार का है.

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यह स्तूप  सिर्फ बर्फ का पिरामिड भर नहीं है बल्कि लद्दाख के लोगों के लिए संजीवनी है. लद्दाख के मौसम को आप यूं समझिए कि यह भारत का आर्कटिक है. सर्दियों में यहां का तापमान माइनस 30 से माइनस 50 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है. पूरा लद्दाख बर्फ की चादर में ढक जाता है. गर्मियों में भी राहत नहीं मिलती. गर्मी में पानी पाने के लिए पहाड़ों के ऊपर चढ़ाई करनी पड़ती है. इससे लद्दाख के लोगों की कठिन दिनचर्या और मुश्किल हो जाती है.

मेकेनिकल इंजीनियर वांगचुक ने देखा की बर्फ को पिघलने के लिए उसका बड़े इलाके में फैला होना जरूरी है. वांगचुक ने सोचा कि अगर बर्फ को एक छोटे दायरे में सीमित कर दिया जाए तो वह धीरे-धीरे पिघलेगा और जब वह पिघलेगा तो उससे गांव वालों की पानी की समस्या दूर हो जाएगी.

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वांगचुक ने पहला स्तूप 2014 में एक प्रयोग के तौर पर बनाया था. उन्होंने अपने स्कूल के बच्चों के साथ मिलकर सिंधु नदी के किनारे एक पाइप डाला और उसके पानी से आईस स्तूप बनाना शुरू कर दिया. फरवरी तक स्तूप बनकर तैयार भी हो गया, वांगचुक ने शुरुआती तौर पर मार्च तक स्तूप के जमीन रहने का अनुमान लगाया था लेकिन मई की चिलचिलाती धूप में भी स्तूप खड़ा रहा. उसी दिन वांगचुक ने उस एक स्तूप को अभियान में बदल दिया. अक्टूबर 2014 में जम्मू कश्मीर के राज्यपाल एन एन वोहरा ने भी सहयोग करते हुए आर्टिफीसियल ग्लेशियर प्रोजेक्ट लॉन्च किया.

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आइस स्तूप से पिघलते पानी को पाइप के जरिए खेतों से जोड़ा गया था. 6 महीने बाद आइस स्तूप बिगड़ गया लेकिन इस दौरान इससे आसपास लगाए 5 हजार पौधों को गर्मी में पानी मिलता रहा. इस सफल प्रयोग के बाद वांगचुक और उनकी टीम की तैयारी ऐसे 50 से ज्यादा स्तूप बनाने की है और वह भी करीब 100 फीट ऊंचे जोकि पानी की कमी पूरी कर पाएंगे.

वांगचुक का अनुमान है कि एक बड़ा स्तूप गर्मी में 30 हजार से भी ज्यादा पेड़ों को खींच सकता है. यह लद्दाख के स्थानीय किसानों के लिए एक फायदे का सौदा हो सकता है क्योंकि 10 आइस स्तूप 2 लाख पेड़ों में बहार ला सकता है और इससे सवा आठ करोड़ तक की कमाई भी हो सकती है.

आइस स्तूप बेशक साइंस के एक मामूली फार्मूले पर आधारित है लेकिन इसने लद्दाख की काया बदल दी है. उनकी मुश्किल जिंदगी आसान हो रही है

क्या है आईस स्तूप के पीछे का विज्ञान 

आइस स्तूप को बनाने के लिए बहते पानी को पाइप की मदद से ढलान पर लाया जाता है. गुरुत्वाकर्षण बल के कारण ऊंचाई से आता पानी पाईप में प्रेशर बनाता है और पानी तेजी से फव्वारे की तरह बाहर निकलता है लेकिन तापमान माइनस में होने के चलते पानी पाइप से निकलते ही बर्फ बन जाता है और कुछ हफ्तों में यह बर्फ पहाड़ में बदलने लगती है. स्तूप की चोटी से पिघलता पानी भी हवा के संपर्क में आते ही दोबारा बर्फ बन जाता है. यहां यह बात गौर करने वाली है कि प्राकृतिक रूप से जमी बर्फ के मुकाबले कृत्रिम ग्लेशियर की बर्फ 5 गुना धीमे पिघलती है और धीरे-धीरे पिघलती यह बर्फ लद्दाख के हजारों लोगों को नई जिंदगी दे रही है.

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लद्दाख में जन्मे 50 साल के सोनम वांगचुक लद्दाख के लिए जीते हैं. आईस स्तूप का कारनामा तो उन्होंने हाल ही में किया है लेकिन लद्दाख के नाम अपनी जिंदगी उन्होंने बहुत पहले से कर दी थी. श्रीनगर में इंजीनियरिंग पढ़ने के दौरान सोनम अपनी कॉलेज फीस का इंतजाम करने के लिए दसवीं के छात्रों को कोचिंग दिया करते थे लेकिन फिर एक खबर ने उनकी रातों की नींद उड़ा दी. उस दिन जम्मू कश्मीर के सारे अखबार एक खबर से पटे पड़े थे कि हर साल पंचानवे फ़ीसदी छात्र मैट्रिक में फेल हो रहे थे. सोनम ने माना कि इतनी ज्यादा संख्या में छात्रों के फेल होने के पीछे सिस्टम का फेल होना है और उन्होंने इसे बदलने की ठानी. उन्होंने एक संगठन या कहिये अपना एक स्कूल बनाया जिसका नाम है- एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (SECMOL)

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सोनम अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर 1988 से लद्दाख में एजुकेशनल एंड कल्चर मूवमेंट ऑफ लद्दाख चला रहे हैं. इस स्कूल की वजह से आज लद्दाख में पास होने वालों की संख्या 75 फ़ीसदी है.

उनके द्वारा चलाया जा रहा SECMOL हमारी एजुकेशन सिस्टम के समानांतर ही चलने वाला स्कूल है. एक ऐसा स्कूल जो बच्चों को किताबी कीड़ा नहीं बनाता. आगे बढ़ने की रेस में आंखें मूंदकर भागने को नहीं कहता बल्कि बिल्कुल वैसे जैसा आपने थ्री इडियट के रैंचो के स्कूल में देखा था. उनकी संस्थान में किताबों में लिखे आंकड़े नहीं हटाए जाते बल्कि जिंदगी जीने का फार्मूला सिखाया जाता है. मुसीबतों से लड़ने का हौसला दिया जाता है. साइंस और मैथ के फंडे असल जिंदगी में लगाने का तरीका सिखाया जाता है. उनके स्कूल के कुछ छात्रों ने देश दुनिया में नाम कमाया है. सेवांग रिगजिन मैट्रिक में पांच बार फेल हुए लेकिन महज 27 साल की उम्र में लद्दाख हिल काउंसिल के शिक्षा मंत्री बने. स्तनज़िन दोरजाई मैट्रिक में चार बार फेल हुए लेकिन आज एक सफल फिल्ममेकर हैं. स्तनज़िन ने भारत समेत कनाडा, फ्रांस फिल्म फेस्टिवल में कई अवार्ड जीते हैं. थिनलस चोरोल मैट्रिक में तीन बार फेल हुई मगर आज एक सफल कारोबारी हैं. इन्होंने इन्होंने ऑल वीमेन ट्रैवेल कंपनी बनाई. कई देशी-विदेशी जर्नल में इनका नाम छपा  पर्सन ऑफ द ईयर के सम्मान से भी सम्मानित की गई. यह सभी सोनम वांगचुक के संस्थान की देन है.

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सोनम वांगचुक के संस्थान का फंडा भी बेहद दिलचस्प है. यहां स्कूल कॉलेज में फेल होने वाले छात्रों को एडमिशन मिलता है पास होने वालों को नहीं. हां, अगर आप गलती से पास हो गए तो आपके एडमिशन पर विचार किया जा सकता है लेकिन वेटिंग लिस्ट में.

सोनम वांगचुक के संस्थान की इमारत को वहां के छात्रों ने ही तैयार किया है. बेहद ही कम लागत से बनी इस इमारत में रोशनी के लिए बिजली की जरूरत ही नहीं है ना ही लद्दाख की कड़ाके की ठंड में गर्माहट के लिए हीटर की. यह पूरी इमारत सौर ऊर्जा से चलती है. अपने बेजोड़ डिजाइन के चलते यह इमारत लद्दाख की जानलेवा ठंड से भी बचा लेती है. माइनस 25 डिग्री तापमान में भी इसके भीतर पारा 15 डिग्री सेल्सियस रहता है.

सोनम वांगचुक ने अपने अब तक के जीवन में बहुत सारे अवार्ड जीते हैं लेकिन कई बार किसी शख्सियत का कद इतना ऊंचा होता है कि उसे अवार्ड देने के बाद अवार्ड की ही गरिमा बढ़ती है.

सोनम वांगचुक एक ऐसी ही शख्सियत हैं.

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हम सबकी तरफ से उनको

सलाम!

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