ग्लोबल गुमटी

नोट बैन

नोट बैन के बाद एक इमानदार पॉकेटमार की व्यथा कथा…

नोट बैन के बाद पॉकेटमार भी हो रहे ईमानदार, रुपयों से भरी अटैची लौटाने  घर तक जाने लगे।

क्रांतियाँ पता नहीं कब हो जाएँ पर जब भी होती हैं व्यवस्था में परिवर्तन ला देती हैं। ऐसी ही क्रांति इन दिनों देश में चल रही है, नोटबैन की क्रांति। देश में 500-1000₹ की नोटें बन्द कर दी गयी हैं। अचानक से इनकी कीमत ऐसी हो गयी है कि बैंक के सिवा सिर्फ़ इन्हें रद्दी वाले ही ले रहे हैं।

नोटबैन होने के बाद व्यवस्था और नियत परिवर्तन की ऐसी बयार चल रही है कि लोग ईमानदारी पर उतर आये हैं, कल तक मोहल्ले का मंगू पॉकेटमार जो, आपकी पॉकेट तब भी मार देता था, जब आप खुद ही पॉकेट में “हरिश्चंद्र की क़सम, पर्स से सारे पैसे बीवी ने शॉपिंग के लिए निकाल लिए हैं, कुछ नहीं है इसमें” का बोर्ड लगाकर भीड़ से घर जाते थे। वही मंगू आज, एक ईमानदार इंसान बन गया है।

कल राह चलते, 500-1000₹ के बंडलों से भरी अटैची सड़क पर गिरी देखी तो उसका दिल द्रवित हो उठा, जबकि उस अटैची पर साफ़-साफ़ उभरे हुए अक्षरों में लिखा था, “जिसे ये अटैची मिले वो अपने पास रख ले या किसी कूड़ेदान में डाल दे, मुझे वापस नहीं चाहिए।” इस नोट के पढ़ने के बाद भी उसने निश्चय किया कि वो अपने प्रोफेशन से मुंह तो मोड़ सकता है पर ईमानदारी से नहीं। गली के उस मशहूर पॉकेटमार मंगू ने, उस क्षण दृढ़संकल्प लिया कि उस अटैची को उसके मालिक से मिलाकर ही रहेगा।

अटैची खोलने पर, उसने भरसक प्रयास किया कि उसके मालिक का पता मिल जाए और वह उसे उसके पास सुरक्षित पहुँचा दे, पर अटैची में पता ठीक उसी तरह नहीं मिला जैसे आजकल 1000 के खुल्ले नहीं मिल रहे। अटैची में पता न मिलने के बावजूद भी मंगू ने हार नहीं मानी और निकल पड़ा उन नोटों के मालिक की खोज करने।

सुबह 8 बजे ही मंगू SBI की एक शाखा में इन्कवायरी के लिए लाइन में लग गया। लाइन इतनी लम्बी थी कि उससे धरती के 2 चक्कर पूरे किये जा सकते थे। मंगू ज़रा भी विचलित नहीं हुआ, शाम तक इंतज़ार करता रहा। शाम को जब नंबर आया, उसने बेहद विनम्रतापूर्वक बैंककर्मियों से याचना की, कि नोटों के सीरियल नंबर से पता करके बताये कि ये नोट किसे इशू हुए थे, वरना वो यहीं आत्मदाह कर लेगा।

एक पॉकेटमार की ऐसी ईमानदारी और पागलपन देख बैंककर्मियों ने फ़ौरन NIA एवं अन्य जाँच एजेंसियों की मदद से उन नोटों के मालिक का पता खोज निकाला। पता मिलते ही पॉकेटमार मंगू को इतनी ख़ुशी और आभार महसूस हुआ कि उसने, भूतकाल में कभी उन बैंककर्मियों के मारे गए सभी रुपये, सूद समेत वापस कर दिए।

दिन भर का भूखा पॉकेटमार मंगू पता पाते ही, नंगे पैर उस पते की ओर भागा, जैसे उसे कुम्भ में बिछड़ा हुआ अपना सगा भाई मिल गया हो। पते पर पहुँचते ही, मंगू ने खुद की पीठ थपथपाई और सरप्राइज़ देने के लिए अटैची को अपनी पीठ के पीछे छुपाते हुए डोरबेल बजाई। मालिक ने दरवाज़ा खोला, दरवाज़े पर अज़नबी को देख, एक बारगी तो वह खुश हुआ कि शायद कोई ख़बर देने आया हो कि जो जान बूझकर अपनी 500-1000₹ की नोटों को सरेराह फेंक रहे हैं, उन्हें 1 अप्रैल को वीरता पुरुस्कार दिया जायेगा, पर मंगू के हाथों में अपनी अटैची देखकर वह आग बबूला हो गया।

इससे पहले कि मंगू उन्हें वो अटैची देता, उस मालिक ने दरवाज़े मंगू के मुहं पर दे मारा और धमकाते हुए बोला अग़र ज़बरन उसे, उन नोटों का मालिक बनाने की कोशिश की तो वो उसके ख़िलाफ़ उससे जबरदस्ती करने के जुर्म में पुलिस में एफआईआर दर्ज़ करवा देगा।

मंगू तबसे सदमे में है और बस एक ही बात कहे जा रहा है, 500-1000₹ के नोट क्या बैन हुए, लोग एक पॉकेटमार को सुधरने और ईमानदार भी नहीं होने दे रहे।

नोट बैन

सौरभ मिश्रा

लेखक लखनऊ में रहते हैं और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं|

फेसबुक प्रोफाइल के लिए क्लिक करें.

Leave a reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

आपकी भागीदारी