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बकरे की पूँछ

बकरे की पूँछ

बकरे की पूँछ

बकरे की पूँछ ये कौन सी शीर्षक हुआ कहानी का? पूर्वांचल का हरेक बकरा अपनी पूँछ में एक कहानी लिए या कहानी बनने के लिए, ख़ाली खेतो में, खलिहानों में, नहरो के किनारे आपको चरता मिल जाएगा।

बाबूजी ने माई को कभी बकरी पालने की अनुमति नहीं दी। मैं माई से हरदम कहता था कि एक बकरी खरीदवा दो बाबूजी से, मैं गाँव के बच्चों के साथ बकरी चराने जाऊंगा। लेकिन बकरी खरीदनी तो बाबूजी को ही थी, जो वो कभी खरीदते नहीं। चरवाही के खेल की वजह से बड़की माई की बकरियों को मैं ही चराता था। उनका कोई बेटा तो नहीं है लेकिन उन्होंने हमेशा मुझे अपने बेटे से बढ़कर ही प्यार दिया और आज भी देती हैं। आज महीनो बाद जब उनसे मिलने गाँव जाता हूँ तो मेरे ना चाहते हुए भी मुझे पानी पिलाने के लिए नल से वही पानी भर के ला देती हैं| पर जब उनके साथ रहता था तो दिन भर मैं ही उन्हें पानी भर के पिलाता था बस फर्क यही है अब। शायद वो समझती हों क़ि अब मैं बड़ा हो गया हूँ लेकिन उन्हें क्या पता मैं आज भी वही हूँ जो दिन भर उनका अरहवल- टिकोरा ( भोजपुरी का एक शब्द जिसे हम कहना मानना कह सकते है) करता था। किसी जग-परोजन (विशेष दिन, जैसे – शादी, जन्मदिन-त्यौहार) में जब वो मेरे घर आती हैं तो उन्हें किनारे बैठाकर अपने हाथों से खाना परोस कर खिलाना एक सुखद अहसाह होता है।

खैर आते है बकरे की पूँछ पर । बड़की माई हमेशा एक बकरी पालती थी। बड़का बाउजी के शराब पीने की वज़ह से उनकी दुकान टूट चुकी थी इसलिए बकरी और थोड़े बहुत खेत ही आय के स्रोत थे। बकरी और उसके दो-तीन बच्चों को चराने की जिम्मेदारी हमारी थी। जिम्मेदारी क्या? बकरीचरवा दोस्तों के चरवाही का खेल माई के हर रोज मना करने के बाद भी मुझे चरवाही में ले ही जाता था। चरवाही में हर शाम नहर के किनारे खो-खो, कबड्डी, गोली और गिल्ली डंडा का खेल शुरू हो जाता था। कभी-कभी तो हम खेल में इतने मशगूल हो जाते थे कि कई बार बकरियाँ और बकरे आस- पास के खेतों की हरी फसल भी खाने लग जाते।
जिस दिन पकड़े जाते उस दिन तो क़यामत ही आ जाती| गाली, डाँट और कई बार बकरियों को ढाठर ले जाने की धमकी। ढाठर क्या होता है मैं आज तक नहीं जान पाया| लेकिन बड़की माई से पूछने पर कहती थी क़ि खेत वाला बकरियों को जेल में बंद करवा देगा और हमें थाने में जुर्माना देकर बकरियों को छुड़ाना पड़ेगा। कई बार तो बकरियाँ किसी और की होती थी और गालियां कोई और सुन जाता था। जिस दिन मैं गाली सुन जाता उस दिन तय कर लेता क़ि कल से बकरी चराना बंद लेकिन अगली शाम होते ही चरवाही के खेल की याद में पिछले दिन की सारी बातें भूल जाती थी।
देखते – देखते बकरी के बच्चे बड़े हो गए, इतने बड़े कि उन्हें अब कसाई के हाथों बेचा जा सकता हैं। मतलब अब अच्छा वजन हो गया है, अच्छे पैसे मिल जाएंगे।

वो दोपहर भी आ गयी जब कसाई बड़की माई के घर बकरे को खरीदने आया है। दाम – काम हो गया। मैं ख़ुश भी हूँ और दुखी भी। ख़ुश इसलिए हूँ क़ि जब बकरे को कसाई ले जाने लगेगा तो बड़की माई कसाई से मुझे बीस से तीस रुपये बकरे की पूँछ के नाम पे दिलवा देगी। क्योंकि बकरे को मैंने ही चराया हैं, और कसाई से पूँछ का पैसा यही कह के माँगा जाता है क़ि इसने बहुत मेहनत से इसको चराया है । पूँछ के पैसों से मैं ढेर सारा लेमनचूस, पानी में डूबो कर खाने के लिए एक टाइगर बिस्कुट और एक बड़ा सा लिखो- फेंको कलम खरीदूंगा। और दुःख इस बात का है क़ि जिसको मैंने महीनो से चराया हैं उसको आज शाम बाज़ार में काट दिया जाएगा।
जब हम बकरियाँ चराकर वापस घर लौटते थे तो सारे दोस्त एक दूसरे की बकरियों के पेट देखते थे क़ि किसकी बकरियों ने आज कितनी घास खाई है और कौन आज घर पे डाँट सुनने वाला है। जिस दिन मेरी बकरियाँ ख़ूब चर लेती या कम चरती उस दिन दोस्त कहते थे क़ि आज तुम्हारी बकरियाँ ख़ूब खाई हैं या आज इनका पेट नहीं भरा है। तुम्हारी बकरियाँ में जो ‘तुम्हारी’ शब्द था न वह बकरे से एक अपनापन सा जुड़ाव पैदा कर देता था। और आज मेरा यह बकरा काट दिया जायेगा।
ख़ैर कसाई ले गया बकरे को, बकरियों में से एक बकरा कम हो गया।

आज पैसे पाया हूँ, मैं चला चौराहे मिठाइयां खरीदने, आज तुम ही चरा लेना बड़की माई बकरियों को। मैं कल से जाऊँगा।

जीवन के हर पहलु में एक कहानी छिपी है।

       देवपालिक गुप्ता 

 देवपालिक शिक्षा से इंजीनियर हैं पर शौक से लेखक. मूलतः पडरौना, उत्तरप्रदेश से आते हैं और आजकल दिल्ली में निवास करते हैं.

 

 

 

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