ग्लोबल गुमटी

उसे धर्म ने नहीं मारा…

उसे धर्म ने नहीं मारा…धर्मान्धता ने मारा 

कुछ दिन पहले एक जैन लड़की 68 दिन का उपवास करने के बाद मर गयी। बताते हैं कि धंधे में घाटा होने के कारण यह ‘पुण्य कार्य’ करवाया गया था। वहाँ के धर्म गुरु ने भी सपोर्ट किया। लड़की के मरने के कारण मामले ने तूल पकड़ा हुआ है और लोग परिवार को और जैन धर्म की इस आस्था को भरपेट गाली दे रहे हैं।

अब कुछ पहलुओं पर हम विचार करते हैं-

पहली बात उपवास का शाब्दिक अर्थ क्या होता है?

उप+वास अर्थात् अपने समीप वास। आम तौर पर दुनिया के लिए हम समय निकल लेते हैं लेकिन अपने पास रहने का सोचते भी नहीं है। बस, अंतर्मन के संतुलन को बनाए रखने का अभ्यास ही तो उपवास है फिर ये खाना छोड़ने की बात को इतनी प्राथमिकता क्यों दी जाने लगी है?
जैन धर्म के श्लोक के हिसाब से भी-  “कषाय (क्रोध, घमंड, छल कपट, लोभ), विषय (भोगों में अटकना) और आहार के त्याग का नाम उपवास है।” * आहार अर्थात् भोजन के त्याग को आख़िरी स्थान दिया है। मूलतः विभिन्न प्रकार के विकारों के त्याग को प्रधानता दी है लेकिन वाह री कलियुगी क़िस्मत! लोगों ने बाहर से दिखने और मान अर्जित कराने वाली चीज़ को अपना लिया और मूल विषय से विषयांतर हो गए।

यह तो हुई नींव में खोट होने की बात। भारतीय धर्मों के तप एवं आचरण के सिद्धांतों की मानो झंड ही कर के रख दी। अब कुछ और बातों पर ग़ौर करते हैं।
एक चुटकुला तो अपने सुना ही होगा जिसमें लड़का गणेश जी से स्कूटर की गुहार लगाता है और गणेश जी जवाब देते हैं-  “मक्कार, हम ख़ुद चूहे को अपना वाहन बनाए हुए हैं और तुम्हें स्कूटर लाकर दे दें।”

बस इसी तर्ज़ पर सोचिए कि जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर तो घर-बार छोड़ कर जंगल में चले गए। अपरिग्रह (जगत की वस्तुओं से दूर रहना) का सिद्धांत प्रतिपादित किया, और तुम उनके नाम में उपवास करा के धंधा सही कराना चाहते हो। महावीर और उनके सिद्धांतों को दीमक लगा दिया है। धंधा बिना खाकर अच्छा होने लगे तो मोटे-तोंदू लोग अरबपति कैसे हो गए और सड़क पर भूख का मारा ग़रीब कैसे बैठा हुआ है। 

एक प्रश्न मेरा उन धर्म गुरु को लेकर भी है।

क्या वे धर्म गुरु गृहस्थ हैं या सन्यासी? यदि गृहस्थ हैं तो वो स्वयं अपना धंधा क्यों नहीं बढ़ा लेते उपवास करके और यदि सन्यासी हैं तो लोगों को सन्यास ना लेने की बजाय उलटी प्रेरणा क्यों दे रहे हैं। ऐसा तो वही कर सकता है जो अपने स्थान से ख़ुश ना हो (जैसे engineer किसी को भी engineer बनने की सलाह नहीं देता), ऐसा है तो फिर काहे के धर्म गुरु?

अभिभावक कह रहे हैं कि यह उसकी स्वयं की मर्ज़ी थी और जैन धर्म के शास्त्रों के अनुसार 8 वर्ष से अधिक उम्र का बालक समझने योग्य हो जाता है। सही बात है। बालक कई बातें समझने लगते हैं लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं कि आपका अधिकार उस पर से ख़त्म हो जाता है और साथ ही अक़्ल भी। आप मना करें और वो ना माने तो बात अलग है। क्या 50 दिन बाद भी आपको नहीं लगा कि लड़की मर जाएगी, खेल ख़त्म करते हैं। और धर्म की आधी-अधूरी बात क्यों करते हैं। ये भी तो बताइए कि उसी धर्म के अनुसार यहाँ तक कि सन्यास लेते समय परिवार की अनुमति आवश्यक होती है फिर ये तो एक बच्ची है। नहीं देते आप अनुमति।

आश्चर्य नहीं कि युवाओं का रुझान इस तरफ़ से क्यों हटता जा रहा है। धर्म के नाम पर टोने-टोटके, रोना-धोना, जुलूस, लड़ाई आदि ज़्यादा होती हैं और विश्व एवं व्यक्तिगत शांति-जिसके लिए ये बने थे, वो दूर कहीं क्षितिज के पार चला गया है। धर्म का अंधानुकरण और ठेकेदारी ज़्यादा हो रही है।

इन सबके बावजूद अब आख़िरी में एक प्रश्न में आप सब से भी करना चाहता हूँ।

क्या कुछेक विपरीत घटनाएँ होने पर उस धर्म और उसके सिद्धांतों को (बिना सोचे समझे) नकारना सही है? आप को नहीं लगता कि जो सिद्धांत काल के विकराल गाल से अभी तक बचे हुए हैं क्यों ना अच्छे तथ्य उसमें से ग्रहण किए जाएँ।

अवश्य ही उपवास में भोजन का त्याग आता है लेकिन इस काया-क्लेश का सदुपयोग किया जा सकता है। आप जानते ही हैं गाँधी आत्म-नियंत्रण और अनुशासन वृद्धि के लिए इसका प्रयोग किया करते थे। प्रयोग फ़लित होता है इसके कई प्रमाण हैं। मैंने स्वयं किया हैं। सभी दर्शनों और धर्मों में उपवास को अलग-अलग तरीक़े से माना ही गया है। बस, उसकी तह तक जाने की ज़रूरत है। पता चला, नवरात्रि में उपवास तो कर लिया लेकिन भूख ज़ोर से लगी है तो ध्यान भटकाने के लिए गप्पें देकर, दूसरों की निंदा करके समय ग़वांने लगे। फिर उपवास का क्या मतलब रहा लोगों के बीच नाम होने के अलावा।

हम अभिप्राय छोड़ चुके हैं बस बेवजह की क्रियाओं में लगे पड़े हैं। कितना सरल है कषाय (क्रोध, घमंड, छल कपट, लोभ) याद रखना। बस ये छोड़ दो और खाना ना छोड़ो तो भी अच्छा लेकिन ये ना छोड़ो और खाना छोड़ो, तो सब किया-कराया चूल्हे में।

*कषायविषयाहारो त्यागो यत्र विधीयते।
    उपवास स विज्ञेय तपस्वी स प्रशस्यते।।*

लेखक स्वयं को ‘इण्डियास्तानी’ कहलाना पसंद करते हैं और व्यवस्था के सम्बन्ध में बहुत प्रमाणिक ज्ञान व् दृष्टी रखते हैं. जैन धर्म को भी  ये बहुत गहराई के स्तर पर समझते हैं| 

3 Comments on “उसे धर्म ने नहीं मारा…

Leave a reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

आपकी भागीदारी