ग्लोबल गुमटी

tribute to Amrita pritam

तुम रह गयी मेरी हर डायरी के पहले पन्ने में हमेशा के लिये

मेरी अमृता

आज के दिन तुम इस दुनिया को छोड़ कर चली गयी, शाम को टीवी में देखा कि “लेखिका अमृता प्रीतम का निधन ” तो कुछ अटक गया गले में, बाथरूम गयी और रो पड़ी, बहुत देर तक रोती रही, लगा कोई हाथ छोड़ रहा है, कुछ ऐसा जिसे मैं छोड़ना नहीं चाहती. पर तुम्हें जाना था और तुम चली गयी.

अमृता प्रीतम ………… एक इश्क सा है तुमसे जब से समझा कि जादू तो शब्दों का होता है, जबसे जाना कि हर वो शख्स मुझे इंस्पायर करता है जो डरता नहीं, डरता नहीं व्यक्त करने में, डरता नहीं जीने में, डरता नहीं टूट कर इश्क करने में. सबने तुम्हें साहिर और इमरोज़ के खांचों में डाल कर देखा पर तुम कुछ और थी, तुम उस हिम्मत का नाम थी जिसे साड़ी में लपेट कर छुपा दिया जाता है, जिसे “का” और  “की” के फेर में मार दिया जाता है,तुम कविता लिखती नहीं, कविता को जीती थी. आज जब देखती हूँ कि स्त्री लेखकों पर व्यक्तिगत कटाक्ष फेलो लेखकों से ही आते हैं तो क्या रसीदी टिकट भेजना बच कर लिखने वालों को “गेट लॉस्ट ” कहने जैसा नहीं था.  यह  सिर्फ तुम ही कह सकती थी कि

“तुम किसी से रास्ता न मांगना 
   और किसी भी दिवार को 
    हाथ न लगाना 
    न ही घबराना 
    न किसी के बहलावे में आना 
    बादलों की भीड़ में से 
    तुम पवन की तरह गुजर जाना.”

जब भी तुम्हें पढ़ा कुछ पिघलता है अन्दर, बूँद बूँद रिसता है, कुछ टूटता है जिसे अगर तुम भी सामने होती तो नहीं बता पाती. अगर तुमसे कहना हो तो यही कहूँगी

“यह आग की बात है
तूने यह बात सुनाई है
यह ज़िंदगी की वो ही सिगरेट है
जो तूने कभी सुलगाई थी

चिंगारी तूने दे थी
यह दिल सदा जलता रहा
वक़्त कलम पकड़ कर
कोई हिसाब लिखता रहा”

अधूरी ख्वाहिशों के फेहरिस्त में एक सबसे बड़ी टीस है – तुमसे न मिल पाना. तुमसे कहने की कोशिश करना कि तुम क्या हो मेरे लिखने में, तुम कहाँ हो मेरे होने में पर मैं जानती हूँ कि ये सिर्फ सोचने भर में एक शेप लेता है,असल में गर तुमसे मिलती तो शब्द गले में ही दुबककर बैठ जाते,निकलने से इनकार कर देते.

“ यूँ तो जहाँ में मशहूर है इमरोज़ का फ़साना

  पर मुहब्बत तो हमने भी तुमसे कम नहीं की है “

आज के दिन तुम चली गयी इस दुनिया से हमेशा के लिये और रह गयी मेरी हर डायरी के पहले पन्ने में हमेशा के लिये.

डॉ. पूजा त्रिपाठी 

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