ग्लोबल गुमटी

पद्मिनी तो कल्पना है, असली तो वीर कुंवर-धरमन की प्रेमकहानी है…

भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के बारे में थोड़ी भी जानकारी रखने वाले ने वीर कुंवर सिंह का नाम जरुर सुन रखा होगा। वैसे तो कुंवर साहब की बहादुरी और योद्धा वृत्ति पर बहुत कुछ लिखा-पढ़ा गया है। इसलिए यह कोई बताने की अब चीज नहीं है कि 1777 में शाहाबाद जिले के जगदीशपुर गांव में एक गौरवशाली भोजवंशी जमींदार परिवार में जन्म लेने वाले कुंवर साहब की अपनी जागीरदारी के मामलों में कोई खास रुचि कभी नहीं रही। जागीरदारी का सारा बोझ अपने छोटे भाई अमरसिंह पर डाल कर समाज में एक मस्त कलंदर की जिंदगी जीने वाले कुश्ती- अखाड़े और तलवारबाजी के शौकीन कुंवर साहब जमींदारी के मामलों में तभी हस्तक्षेप करते थे जब बटाईदारों के हित पर कोई आंच आती थी। यह भी अब चर्चा का कोई खास बिंदु नहीं लगता कि कुछ अंग्रेज़ों से घनी मित्रता के बावजूद भी कुंवर सिंह अपने जीवन में कभी भी अंग्रेजनिष्ठ नहीं हो पाये और वक्त आने पर फिरंगियों का काल बनकर बिहार और उत्तरप्रदेश से लेकर मध्यप्रदेश तक उनको खदेड़ते हुए और नाको चने चबवाते हुए किस प्रकार वीरगति को प्राप्त हुए थे ।
परंतु कुंवर साहब के लड़े गये युद्ध, समर ज्ञान और अदम्य साहस से भरे किस्सों के अतिरिक्त उन से जुड़ा एक पहलू ऐसा भी है जो जरूर चर्चा के योग्य है……. किसी भी व्यक्ति का जीवन चाहे कितना भी महान और सार्वजनिक क्यों न हो फिर भी उसके भीतर एक निजी जीवन हमेशा जिंदा रहता है कुंवर सिंह की इसी निजी जिंदगी का नाम थी धरमन बाई, जिसे बाबूसाहब नन्हीं जान बुलाते थे ।
धरमन बाई तत्कालीन आरा की मशहूर तवायफ थी, मल्लिका-ए-हुस्न और मल्लिका-ए-तरन्नुम की प्रकट देवी थी धरमन बाई।
कुंवर सिंह मुजरों के कोई खास शौकीन नहीं थे पर जब एक बार अंग्रेजी सोहबत के कारण धरमन बाई के मुजरे में गये तो धरमन बाई की महफिल हमेशा के लिए कुंवर साहब की हो गयी। पहली ही नजर में धरमन बाई बाबू साहेब को दिल दे बैठी। दो-एक महफ़िलों के बाद कुंवर साहब भी घरमन से अगाध मोहब्बत करने लगे थे, लेकिन रूढ़िवादी और वंश की इज्जत के प्रति सजग कुंवर साहब एक मुस्लिम तवायफ से “सिर्फ मोहब्बत” से आगे नहीं बढ़़ पाते थे ।
लेकिन फिर भी शादी हुई ।
जनश्रुतियों और आरा के लोकमानस में रचे बसे किस्सों के मुताबिक नन्ही जान और कुंवर साहब की शादी का संयोग बनने की दो कहानियाँ उभर कर आती हैं ।लोककथा और लोकगीतों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि नन्ही जान और कुंवर सिंह की मोहब्बत की कहानी उस जवार में सरेआम हो चुकी थी । नन्ही जान कुंवर सिंह की मोहब्बत में पड़कर मुजरे कम करने लगी थी और करती थी भी तो घूंघट में पाबंद रहकर ।
जगदीशपुर के बगल के किसी राजा को यह बात पता थी उसने नन्हीं जान को मुजरा करने के लिए किसी तरह तैयार कर लिया , उसने कुंवर साहब को जलील करने के लिए उन्हें भी मुजरे में आमंत्रित किया, वह जागीरदार यह बात जानता था कि कुंवर सिंह की वजह से ही धरमन घूँघट नहीं उठाती है, वह नन्ही जान के ऊपर मुहरों की बरसात कर के बिना घूंघट के महफिल में नचवाना चाहता था । लाख कोशिशों के बाद भी जब नन्ही जान ने घूंघट नहीं हटाया तब उस दोस्त जागीरदार ने नन्ही के साथ कुछ धृष्टता की कोशिश की । यह देख जब कुंवर साहब तमतमा कर उस जागीरदार की तरफ लपके, तब तक नन्ही जान बिजली की गति से कुंवर साहब के सामने घूंघट हटा कर खड़ी हो गई कुछ लम्हे एक दूसरे की नजरों में तैरने के बाद बाबु साहेब ने नन्ही का घूँघट गिरा दिया ।

नन्ही हाथ जोड़े और सिर झुकाकर खडी रही मानो इस याचना की मुद्रा में कि “बाबू साहब नन्ही जान सिर्फ आपकी है इसे अपना लीजिए…… । “महफिल में भी चारों तरफ से कुंवर साहब से गुहार होने लगी कि नन्ही को अपना जीवनसाथी कुंवर सिंह बना लें। दबाव के चलते कुंवर साहब ने कमर में बंधी कटार नन्ही जान के हाथों में पकड़ाते हुए कहा कि “इसे संभाल कर रखना इसमें बड़ी आग है”…..इस तरह धरमन बाई हमेशा के लिए कुंवर सिंह की नन्ही जान बन गई ।

कुंवर साहब और धरमन बाई की शादी का दूसरा किस्सा भी कम रुचिकर नहीं है …….कहते हैं होली का दिन था कुंवर साहब की महफिल जमी हुई थी । दोनों पहले से ही एक दूसरे की मोहब्बत में आकंठ डूबे हुए थे । उस दिन धरमन के साथ उसकी छोटी बहन करमन भी नाच रही थी दोनों ही बहनें अपनी बला की खूबसूरती के लिए दूर-दूर तक सरनाम थी । शुरुआत में कुछ रंगीन ग़ज़ल-गाने पेश करने के बाद धरमन बाई का मूड बदल गया। उस समय ब्रितानी हुकूमत का वह दौर था जब गोरों का अत्याचार अपने चरम पर था । देश में त्राहिमाम की स्थिति थी, जनता बगावत के मूड में थी बस इन्हीं सब बिंदुओं को आधार बनाकर धरमन ने दर्द भरी आवाज में गाना शुरू कर दिया । उसके गीत महफ़िल में बैठे लोगों को उद्वेलित करने वाले थे । धरमन बीच-बीच में कुंवर साहब को कोसती भी और उकसाती भी। धरमन की करुण आवाज में खुद को धिक्कारने वाला गीत कुंवर साहब से बर्दाश्त नहीं हो सका और उठकर धरमन की कलाई पकड़ ली ।

कुछ देर चुप रहने के बाद धरमन ने कहा कि “आज तक मेरी किसी ने कलाई नहीं पकड़ी और जब आपने पकड़ ही ली हैं तो छोड़ियेगा मत” । बाबू साहेब ने धरमन को अपनी उम्र का वास्ता दिया ……..” धरमन मैं पके आम की तरह हूँ, कब डाल छोड़ दूँगा,भरोसा नहीं ……..” परंतु धर्मन यह कहते हुए की मेरा वादा है कि मैं आपसे पहले मरूंगी और आपकी ही गोद में…..।” यह सुनकर कुंवर साहब ने एक मुट्ठी अबीर उठा कर धरमन की मांग में भर दिया।

इस कहानी का उद्देश्य सिर्फ धरमन और कुंवर साहब की अमर प्रेम कथा को बताना भर नहीं है ,बल्कि इसके माध्यम से एक ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को खोज कर निकालना है जो कुंवर सिंह की अदम्य शौर्य गाथा के पन्नों के ढेर में कहीं दब सी गयी है।
धरमन बाई की पहचान बहुतों के लिए सिर्फ एक तवायफ और कुंवर सिंह की मोहब्बत के रूप में ही है । बहुत कम लोग यह जानते हैं कि धरमन बाई ने 1857 की क्रांति में अद्भुत शौर्य का परिचय दिया था। कुछ शोधकर्ताओं का तो यह भी मानना है कि कुंवर सिंह को क्रांति में कूदने के लिए धरमन ने ही प्रेरित किया था धरमन न सिर्फ व्यक्तिगत रुप से क्रांति में लड़ी बल्कि महिलाओं की एक टोली को भी अपने साथ लड़ने के लिए तैयार किया था, जिस टोली की वह खुद कप्तान थी।
1857 की क्रांति में धन की कमी पड़ने पर कुंवर सिंह के मना करने के बावजूद धरमन ने अपनी पूरी दौलत कुंवर सिंह की लड़ाई में लगा डी । धरमन कुंवर जी के साथ हर लड़ाई में साये की तरह उनके साथ रही । यह बात भी मानी जाती है किै कुंवर सिंह की रीवा पर चढ़ाई के दौरान धरमन और रानी लक्ष्मीबाई की मुलाकात भी हुई थी तथा धरमन ने अपनी महिला टोली की कुछ वीरांगनाओं को लक्ष्मी बाई के साथ फिरंगियों से लड़ने के लिए भेजा भी था । कुंवर सिंह के रीवा से कालपी की चढ़ाई के दौरान अंग्रेजों से घनघोर मुठभेड़ हो गई थी इस लड़ाई में कुंवर सिंह और उनके साथी वीरता से तो लड़े ही धरमन बाई भी एक शेरनी की तरह अंग्रेजों पर भारी पड़ रही थी । धरमन बाई ने खुद तोप से मोर्चा संभाल रखा था ।जब मुठभेड़ समाप्त हुई कुंवर सिंह ने धरमन को खून से लथपथ पाया। कुंवर सिंह नन्ही जान का सिर गोद में रखकर जख्मों को देख रहे थे कि नन्ही जान उन्हें उनका खंजर सौंपते हुए कहा “देख लीजिए इसकी आग मैंने कम नहीं पड़ने दी” और यह कहते हुए ही धरमन ने प्राण त्याग दिया ।
कुंवर सिंह और नन्ही जान की मोहब्बत का  स्मारक आरा में आज भी मौजूद है । कुंवर सिंह ने धरमन के नाम पर आरा में एक चौराहे का नाम धरमन चौक रखा जो आज भी इसी नाम से जाना जाता है आरा में ही धरमन के नाम से एक मस्जिद और एक मकबरा बनवाया जो आज भी सुरक्षित हैं ।धरमन की बहन करमन बाई के नाम पर कुंवर सिंह ने जगदीशपुर के बगल में एक टोला बसाया जो आज भी आबाद है ।
वैसे तो आजादी की लड़ाई में महिलाओं के बलिदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता, फिर भी यह इतिहास का दुर्भाग्य कहिये या मर्दवादी इतिहास लेखन की पक्षधरता, परंतु इसने इतिहास को बहुत नुकसान पहुंचाया है । इस गलती ने महिलाओं के सामयिक मनोबल को बहुत ही क्षतिग्रस्त किया है । धरमन के ही जाति -धर्म की अजीजन बाई को इतिहास ने थोड़ा दर्ज भी किया, फिर भी वह सम्मान अजीजन बाई को भी नहीं मिल पाया जिसकी वह हकदार थी। परंतु धरमन बाई को तो इतिहास ने पूर्णतया उपेक्षित ही कर दिया । क्या कुंवर सिंह की बहादुरी और देशभक्ति के तेज ने इतिहासकारों की आंखे इतनी चौन्धिया दी थीं जो इस तेज के पीछे की आभा धरमन बाई को देख ही नहीं सके जो भी हो धरमन बाई जैसे सेनानी को भुला देना इतिहास की गलती नहीं इतिहास का अपराध कहा जाएगा ।

ज्योति प्रकाश राय

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