ग्लोबल गुमटी

कुछ दिन और रुक जाती माँ

कुछ दिन और रूक जाती माँ…

कुछ दिन और रूक जाती माँ!

बिहार के पश्चिमी चंपारण में नारायणी नदी के किनारे बसा एक छोटा सा गाँव। गाँव में एक हँसता – खेलता छः लोगो का परिवार। दादी माँ, माँ, बाबूजी और तीन भाई।
“इस साल गन्ना का फसल अच्छा होने वाला है, जिस तरह पिछले साल भाव रहा अगर इस बार भी इसी तरह रह गया तो मुझे विदेश जाने के लिए ज़्यादा क़र्ज़ नहीं लेना पड़ेगा।” रात को भोजन के वक़्त असग़र अपने पत्नी से कह रहा था।
और देखो ना नदी का बांध कब टूट जाए, और हमारा सब कुछ कब बर्बाद हो जाए इसका कोई ठीक नहीं है। इसलिए विदेश से कुछ पैसे कमा लूंगा तो यूपी में एकाद कठ्ठा जमीन ख़रीद वही बस भी जाया जाएगा। गाँव के लगभग सारे लोगों ने कही ना कही जमीन ले लिया है। बाढ़ आने पर सबका ठिकाना रहेगा सिवाय हम लोगो के।

“मेरा भी तबियत खराब ही रहता है, माँ का भी वही हाल है। आप चले जायेंगे तो बच्चो को और खेत कौन देखेगा? एक आबिद पर कितना बोझ लादियेगा। वैसे भी रोज सुबह साइकिल से दोनों भाइयो को स्कूल लेकर जाता है, उनकी देखभाल करता है। आप चले जायेंगे तो आबिद की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जायेगी।” शायरा बहुत ही भावुक होकर रोटियां बेलते हुए असग़र से कह रही थी।
अरे नहीं कुछ दिनों की बात है , लगभग एक साल में जमीन लेने भर का पैसा हो जाएगा।

इस साल आबिद को स्कूल नहीं भेजते हैं, केवल दोनों भाइयों को स्कूल छोड़ और ले आया करेगा। बाकी समय खेत का काम।
अगले साल तक जब मैं आ जाऊंगा तो किसी अच्छे प्राइवेट स्कूल में तीनों का नाम लिखवा देंगे। और चौराहे पे एक अच्छा दूकान भी खोल लूंगा जिससे रोज का नमक तेल का पैसा भी आता रहेगा।

“हाय आबिद भी ना कितना धीरे बड़ा हो रहा है , जल्दी से बड़ा हो जाए तो घर में एक बहु आये । मेरा कुछ उबार हो।”
“तुम भी हद करती हो आबिद अपने समय से ही बड़ा होगा की तुम्हारे समय से?”

गन्ने की फसल बेचकर और कुछ क़र्ज़ लेकर आज असग़र मुम्बई को रवाना हो रहा है। आज के पाँचवे दिन मुम्बई से सऊदी की फ्लाइट है। शायरा भोर से ही सत्तू वाली लिट्टी और ठेकुआ छान रही थी , ट्रेन के सफ़र के लिए। बिमारी और भोर में ही उठ कर काम करना आज कुछ ज्यादा ही थकी लगी रह रही थी। ये लीजिये आबिद के मामा का फोन नंबर है। स्टेशन पहुंचकर उसे फ़ोन कर लीजियेगा वो आकर आपको अपने पास ही ले जाएगा। फ्लाइट के दिन तक उसके पास ही रह लीजियेगा।

असग़र मुम्बई के लिए निकल पड़ा। अंदर से बाहर सब कुछ छोड़ अब परदेशी होने जा रहा था। घर से दूर शहर जाते वक़त आप जब शहर पहुँच जाए तब परदेशी नहीं होते अपितु घर से बाहर पहला कदम रखते ही आप परदेशी हो जाते है। रास्ते की  कुछ दूरी जो आपके नज़रो के सामने लगभग हररोज आता है आज वह पराया सा लगने लगता है।

आज शायरा की तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही थी, वो सासु माँ और आबिद से अपने तबियत के बारे में बताना उचित नहीं समझी क्योंकि आज एक पिता और एक बेटा परदेशी हो गया था। ख़ैर कैसे भी दिन गुजरा , रात को अचानक से शायरा की साँसे तेज हो गई नाक से ख़ून भी आया एक- दो दफ़ा। शायरा ने आबिद को पुकारा। आबिद माँ की स्थिति देख एकदम से घबरा गया , इतनी रात को ले भी जाए तो कहाँ । गाँव में कोई हॉस्पिटल भी नहीं है ना ही कोई डॉक्टर। हॉस्पिटल के लिए शहर ले जाना पड़ेगा और इस समय कोई सवारी मिलेगी नहीं। आबिद की स्थिति बिगड़ती ही जा रही थी। आबिद ने दादी माँ को जगाकर माँ के पास किया और खुद अँधेरी रात में निकल पड़ा बंगाली डॉक्टर को बुलाने।
डॉक्टर तो पहले आने से मना किये लेकिन आबिद के बहुत गिड़गिड़ाने पर आने को राज़ी हुए । डॉक्टर शायरा को देखते ही समझ गया थे कि कोई बड़ी बीमारी है। आबिद , डॉक्टर साहब को किनारे बुला – “फफक कर रो पड़ा , डाक साहब मेरी माँ को क्या हुआ है “।
“अरे- अरे रोओ मत आबिद मैंने दवाई दे दिया आराम मिल जाएगा लेकिन अहले  सुबह शहर जा डॉक्टर राय से दिखा लेना।”

माँ की स्थिति देख आबिद ने सवारी गाड़ी से जाना उचित नहीं समझा , किराए का टेम्पो बुक किया और माँ को ले शहर को रवाना हुआ । शायरा रास्ते में ही दम तोड़ चुकी थी लेकिन आबिद को विश्वास नहीं हो रहा था अपने- आप को संभाले हॉस्पिटल पहुँचा। रोये भी तो किसके सहारे रोये। रोने के लिए भी किसी के सहारे की जरूरत है।
हॉस्पिटल में डॉक्टर ने ज़बाब दे दिया। वही हॉस्पिटल के सीढ़ियों पे माँ के मृत देह को घंटो निहारता रहा । उस मृत देह में अब भी एक माँ बाकी थी लेकिन बेटा मर चुका था। आँखों में एक बूंद आँशु नहीं जैसे मानो आँशु ,आँख में बर्फ हो गया हो, शरीर पत्थर का हो गया हो। घंटो बाद सेक्युरिटी गॉर्ड ने वहाँ से जाने को जब कहा तब अचानक आँखों ने अपने आशुओं को आज़ाद किया, शरीर पत्थर से हाड़ मांस का हुआ। आबिद जैसे- तैसे लाश को घर ले आया। आबिद नहीं चाहता था कि अब्बू को इसका ख़बर लगे। लेक़िन शायरा के भाइयों की इसकी ख़बर चल चुकी थी , असग़र के स्टेशन पहुचते ही वापस घर भेज दिया।

बार-बार असग़र लिट्टी और ठेकुआ को देख रहा था जैसे उसे देखने से अभी शायरा के जिन्दा होने की खबर आ जायेगी। ट्रेन से आते वक़त कितनी शोरगुल और भीड़ थी ना। आज तो शोरगुल और भीड़ के बाद भी सब कुछ शांत है एकदम। असग़र मन ही मन सोच रहा था काश यह ट्रेन का सफ़र कभी ख़त्म ही नहीं होता।
असग़र के घर पहुचने तक शायरा की लाश दफ़न हो चुकी थी। अपने माँ के गोद में सर रख बच्चो की तरह दहाड़ मार – मार रोने लगा। बस एक ही शब्द जुबान पे थी इतनी भी जल्दी क्या थी , मेरे आने का इंतज़ार तो कर लेती। बच्चे किसके सहारे जियेंगे।
कुछ महीने बीत गए स्थिति अभी सामान्य हो ही रही थी क़ि फिर घड़ी बदल गयी। प्रकृति ने एक और विपत्ति ला दिया। इस बार हर साल से ज्यादा बरसात हो रही थी । नदी का बांध टूट गया पुरे गाँव में पानी भरने लगा।
देखते ही देखते कुछ ही दिनों में पूरा गाँव, खेत खलिहान सब नदी में समा गया।
असग़र पूरे परिवार के साथ एनच 24-बी रोड के किनारे एक झोपड़ी डाल रह रहा था।
नदी के कटान में सारी जमीन- ज़ायदाद का ख़तम होने तथा पत्नी की मृत्यु ने असग़र को एकदम कमज़ोर बना दिया था।
आबिद चाय की दूकान पर झूठे बर्तन धो रहा था और असग़र खेतो में मजदूरी कर दोनों बच्चो का पालन पोषण कर रहे थे।
एक साथ दो – दो विपत्तियों ने असग़र की दिमागी हालात को ख़राब कर दिया। पुरे दिन रोड की किनारे घूमता और ना जाने दिन भर ख़ुद से ही क्या- क्या बाते करता।
पुरे परिवार का बोझ अकेला आबिद पर आ गया। वह भी अब झूठे बर्तन धोना छोड़ , खेतो में कुदाल चलाने लगा।
ऐसे ही समय कटता गया , आबिद के दोनों छोटे भाई ओमैर और आमिर भी बड़े हो रहे थे। लेकिन आबिद ने कभी उन्हें अपने तरह मजदूरी नहीं करने दिया। दोनों पास के ही सरकारी स्कूल में पढ़ते थे।
आबिद अब पूरे पच्चीस को हो चला, बीते आठ सालों में माँ मरी, समूची जमीन – जायदाद नदी हो गयी, अब्बू की दिमागी हालात खराब , दादी माँ भी पिछले साल चल बसी। अब्बू को तो देखे कई बरस हो गए ना जाने अब जिन्दा भी है कि नहीं।
दादी माँ के चले जाने के बाद खाना – बनाने में भी परेशानी होती थी, आस – पास के लोगों ने आबिद को शादी करने का सलाह दी।
आबिद ने शादी करने का फैसला किया , पास के ही गाँव की लड़की थी। उसके मामू ने ही तय करवाया था।
आज आबिद दूल्हा बना है । शायरा का एक सपना था क़ि वो आबिद को दूल्हा बनते देखे।
आबिद जैसे ही घर से बाहर निकल टैक्सी में बैठा बारात ले जाने के लिए आँखों ने पानी की एक धार छोड़ दी और नज़रो के सामने माँ की तस्वीर आ गई। आबिद कहने लगा- “देख माँ आज तेरा आबिद दूल्हा बना है, तुम भी कुछ दिन और रुक जाती तो क्या हो जाता?”

                     देवपालिक गुप्ता

देवपालिक गुप्ता देवपालिक शिक्षा से इंजीनियर हैं पर शौक से लेखक. मूलतः पडरौना, उत्तरप्रदेश से आते हैं और आजकल दिल्ली  में निवास करते हैं.

2 Comments on “कुछ दिन और रूक जाती माँ…

Leave a reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

आपकी भागीदारी